नगई महरा: अंतिम भाग

समीर जी का उत्साह बढ़ाने में कोई सानी नहीं. कल की पोस्ट पर उन्होने एक अच्छी सी टिप्पणी की जिससे फिर से ऊर्जा मिली कि बांकी भाग को भी टाइप कर आप तक पहुंचाऊं.

थक गये हैं, थोड़ा विश्राम प्राप्त करें मित्र.

कार्य इतना उत्तम हैं कि यह कह पाना संभव नहीं कि थक गये हैं तो जाने दिजिये.

बहुत आभार इस पेशकश का. हमारे पास ताप के ताये हुए दिन होती तो जरुर मदद कर देते आपकी, यह तो आप जानते ही हैं. :)

धन्यवाद समीर जी.

लीजिये प्रस्तुत है अंतिम भाग. पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं. निवेदन यही कि पहले उन दोनों भागों को पढ़ लें.

मँड़हे से निकला मैं, वह भी साथ था
पूछ पड़ा, किसके लड़के हो
मैंने शिक्षा जैसी थी अलक्ष को प्रणाम किया
कहा, जगरदेवसिंह मेरे पिता थे
बैरागी बाबू, पूछा उसने
मैंने कहा, उनका यह भी नाम है
उसने कहा, अब ऐसे आदमी दिखाई नहीं पड़ते
धरम जानकर रहे धरम किया

मैं बाहर निकला तो सोचता हुआ निकला
आज जो हुआ वह केवल आज ही हुआ है
और मैंने आज के उड़ंछू शब्दों को
पकड़ पाने के लिए अपने मन को
उद्यत कर दिया
ऐसा कम होता है बहुत कम
जब शब्द किसी समय जी से बतियाने लगें
बुआ से मैंने सबकुछ कहा फिर पुछा
उसका नाम क्या है
बुआ ने कहा नगई
महरिन के माथे से उबहनी लटकाए
मैंने घर जाते देखा था
उधर वही घर था
मुड़ते भी देख लिया उनको
उसी ओर
कई दिनों बाद
गया नगई की मँड़ई पर

नगई खाँची फाँदे बैठा था
हाथों में वही काम
आँखें उन हाथों का
हथवट चिताती हुई
खाँची में लगी एक आँख मुझे भी देखा
और कहा बैठो उस पीढे पर
साफ है मैंनें कुछ पहले ही धोया है
बैठने पर मुझसे कहा
अच्छा बाँच लेते है रमायन
तुम्हारे बाबू कहते थे जैसे
अब कोई क्या कहेगा
उनकी भीतर की आँख खुली थी
सुर भी क्या कण्ठ से निकलता था
जैसे आषाढ़ के मेघ की गरज
मैने कहाँ महरा
मैं तो अभी सीख रहा हूँ
नगई ने कहाँ कितने होंगे
जो जानते हैं वही कुछ सीखना है
बाबू की तपस्या का फल
तुम्हें मिला है मिलेगा
मैं इस सनेहिल असीस से
चुपाया रहा
नगई ने हाथ चलाते चलाते फिर कहा
दुनियां है दुनियां का ज्ञान है आदमी है
आदमी को क्या क्या नहीं जानना है
देखते-सुनते और करते ज्ञान होता है
अपनी जब होती है समझ नयी होती है
मेरे लिए समझ पाना कठिन था
पर रुक रुककर निकले बोल ये
कहीं ठहर गये थे मेरे मन में
अर्थ बहुत बाद में कुछ कुछ पाया
धारणा बेकार में बोझ ढोना ही नहीं है
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समझ ही
आदमी को आदमी से जोड़ती है

वर्ष बीत जाने के बाद, शायद
एक दिन नगई की ओर जा निकला
इतने जन वहाँ मैंने नहीं देखे थे
अपना कुछ काम था फिर भी में रुक गया
नगई की दृष्टि मुझ पर पड़ी
काम रोककर मेरे पास आ गया
और कहा, भात है बिरादरी को न्योता है
दिन परसों निश्चित है
आप कहाँ जाते हो
मैंने कहा काम से
उसने कहा मुझे भी बुझाव है
परसों आना
इज्ज्त मैं क्या दुंगा
फिर भी दसों नँह जोड़े
खड़ा ही मिलूँगा
सेवक हूँ और सेवा करना मेरा काम है

मैं आगे बढ़ गया
उस दिन बडी भीड़ थी
बड़े-बड़े चूल्हे जगाये गये
जिन पर हण्डे कड़ाह चढ़े थे
कहीं भात कहीं दाल और कहीं
तरकारी पकती थी
लकड़ियों की कोई कमी नहीं थी
जंगल के बीच थे चिरानीपट्टी की बस्ती
दोने पत्तल पहले से बनाकर
ठिकाने से रखे थे
ढखुलाही कोई छोटी नहीं थी
ढाक के पेड़ ही पेड़ थे
बड़े और अच्छे पत्ते जिन पर छाये थे
जंगल में क्या कमी
जंगल जिसका हो
उससे कह कर ले लेना था
रोक टोक कोई खास नहीं थी
कई बार आ जाकर
रंग वहाँ का देखा
जो भी मिला काम से लगा मिला
ऐसे लोग भी मिले
जो करते थे कम और बोलते बहुत रहते हैं
आवाज ऊँची से ऊँची हो आती है।
ध्यान इधर उधर जाता है आसपासवालों का
कुछ लोग फिरकी से फिरते हुए
इनके पास उनके पास जाते थे
काम को देखकर बताते थे
ऐसे करो वैसे करो
मैंने सुना, एक कहाँ रहा था, कैसे भला
लेकिन सचेत पाँव कान से कुछ दूर थे
मुँह किसी और हाथ से कुछ कह रहा था

कोई दस बार पाँत बैठी थी
हर बार पत्तलें पचास ऊपर लगती थी
नगई ने तीन बीस का हिसाब रखा था
भोजन करने वाले तुष्ट थे
गाँजा, तमाखू, सुरती, बीड़ी, और पान का
प्रबन्ध था
जब जो जिसे चाहिए
जाकर ले लेता था
कुछ बूढ़े और आदर मान पाने वाले ही
अपनी जगह जमे थे
उनकी सेवा नौजवान करते थे
बार-बार यहाँ या वह पूछकर
सराहना हो रही थी
नगई के यहाँ वहाँ
बड़े लोग भी प्रबन्ध ऐसा
नहीं कर पाते
नगई पर कृपा है भगवान की
इस तरह मान दिया
भार हल्का कर दिया

पंचायत बैठी थी जाजिम पर
पीपल के नीचे
दिन दो घड़ी शेष था
कोतवाल, सिपाही और गोड़इत
जाति के ही लोग थे
बरौछीदार-चँवरदार मक्खियाँ उड़ाते थे
बैठे हुए लोगों को बचाते
हवा पट पड़ी थी इसी कारण
पंखे का प्रबन्ध था पसीना चल रहा था
और बड़े-बड़े पंखे तीन चार हाथों से
हवा को लहराते थे
मैं उभरी पीपल की सोर पर जरा हटकर
बैठा था, मेरी आँखों के लिए
पहली पंचायत थी
चौकीदार ने पुकारा
नगई और लखमनी
दोनों हाथ जोड़े सिर झुकाए हाज़िर हुए
फिर उनका दोस बतलाकर पूछा गया
अपने दोस मानते हो
मानते हैं—दोनों ने साथ कहा
पूछा गया, डाँड़-बाँध तुमको मंजूर है
सिर माथे हमको मंजूर है—दोनों बोले
पंचों ने कहा, दस रुपये की डाँड़ है, भात देना होगा
यह भी मंजूर है
फिर महरिन जल लायी, सबको दिया पीने को
नगई ने हुक्का पिया और बारी-बारी सबको दिया
पंचों ने हुक्म दिया अब तुम दोनों साथ रहो
पंचायत तो मानो पंचपरमेसर है
नगई हाथ जोड़े अब खड़ा हुआ
बोला, जाति गंगा ने मुझे पावन कर दिया
धन्य हुआ
और फिर भोज हुआ
नाच और नाटक हुए.

[‘ताप के ताये हुए दिन’ से]

त्रिलोचन श्रंखला के कुछ और लेख…

1. त्रयी के त्रिलोचन की कवितायें.

2. चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती:त्रिलोचन

3. बिस्तरा है न चारपाई है:त्रिलोचन

4. नगई महरा: त्रिलोचन

5. नगई महरा- 2 : त्रिलोचन

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

6 comments

  1. कैसी बात करते हैं…बिना पढ़े तो हम कभी नहीं टिपियाते. भले नींद की तिलांजली देनी पड़े. 🙂 आप जानते हैं यह…शायद यह आपने दूसरों के लिये लिखा है:

    पहले दो भाग आपने ना पढ़े हों तो वो यहाँ और यहाँ हैं.

    मगर वाक्य के बीच का विराम उतना उन्मुख नहीं हो पाया इसलिये सफाई दे दी.

    आपको साधुवाद कहूँ, पीठ थपथपाऊँ कि गले लगा लूँ…जो आप कहो..इस प्रस्तुति के साथ हम आपके कर्जदार हुए जो आपने इसे हमें समर्पित कर दिया है. दिल्ली में-एक शाम आपके नाम-यह तय रहा. 🙂 फोन नम्बर तो ईमेल करो मित्र.

  2. थोड़ा शब्दार्थ बताने का कष्ट करेंगे तो बड़ी अनुकंपा होगी।
    मँड़हे
    अलक्ष
    उबहनी
    मँड़ई
    खाँची फाँदना
    ढखुलाही
    डाँड़-बाँध

    विनीत,
    आलोक

  3. मैंने पहले इसे पढ़ा। फिर यहां-वहां दोनों हिस्से आज ही पढ़े। विद्वान जानते और मानते होंगे कि यह कविता है। लेकिन मैंने इसे कहानी के रूप में पढ़ा। कविता की तरह लाइनें टूटी हुई थी। इसलिए पढ़ने में थोड़ी दिक्कत हुई। लेकिन जोड़-जोड़ कर पढ़ लिया। पढते-पढ़ते सीधे अपने गांव जा पहुंचा। नगई महरा जैसे चरित्र याद हो आए। लगता है त्रिलोचन ही अपने ही जैसे इलाके के रहनेवाले थे। मेरे गांव में नगई महारा जैसे ही एक बिलोले भगत थे। वो भी धरौआं पर मेहरारू लाए थे। बुआ ने पूछा – बिलोले उधार कब चुकाओगे। बिलोले बोले – अरे बुआ तुम कहां छोड़ने वाली हो, ऊपर पहुंच जाऊंगा तो वहां भी पीछा करोगी। और, बिलोले भगत बड़े मजे में मर गए, मगर रत्ती भर भी उधार नहीं चुकाया।

  4. हमारे कलैथा में भी ऐसे पात्र हैं – मोकालू के अलावा भी। आपने जोश तो दिलाया है; पर देखें कब उनको ब्लॉग पर ठेल पाते हैं!

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