नो सॉरी ..नो थैंक्यू !!

समीर भाई ने लिखा

” अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. ” 

उनका कहना ठीक तो लगता है.लेकिन ये सोचनीय है कि ऎसा आखिर है क्यों और फिर भारत में ही क्यों? हालाँकि उन्होने धन्यवाद देने को टिप्पणीयों से जोड़ा जिससे मैं सहमत नहीं क्योकि ऎसा होता तो अंग्रेजी चिट्ठों में, जिसे तथाकथित वो लोग पढते हैं जो धन्यवाद संस्कृति में विश्वास करते हैं तो उनमें टिप्पणीयां ज्यादा होतीं. लेकिन सच तो यह हैं कि अंग्रेजी चिट्ठों मे हिट्स के मुकाबले टिप्पणीयां बहुत कम होती हैं. यानि हिट्स और टिप्पणीयों का अनुपात हिन्दी चिट्ठों में अंग्रेजी चिट्ठों के मुकाबले कहीं ज्यादा है.

अब आते हैं मूल प्रश्न पर क्यों आम भारतीय धन्यवाद देने या स्वीकारने में हिचकते हैं.मेरा मानना है कि हर देश और समाज के अपने अपने संस्कार होते हैं.भारत के मूल संस्कार भी आत्मसात के हैं ना कि प्रदर्शन के. किसी फिल्म में सुना था ‘इन फ्रैडशिप ..नो सॉरी ..नो थैंक्यू “. मुझे यह सही लगता है. जब हम किसी के अच्छे काम के लिये धन्यवाद या थैंक्यू बोल देते हैं तब हम उसके अच्छे कार्य का मोल चुकता सा कर देते हैं.आपने हमारे लिये ये किया हमने धन्यवाद बोल दिया. हिसाब बराबर. यदि हम धन्यवाद ना देकर उसे आत्मसात कर लें कि आपने हमारे लिये यह अच्छा किया हम भी मौका पड़ने पर आपके लिये अच्छा करेंगे तो आप उस संबंध को और मजबूत करते हैं.यहाँ हम प्रकट में भले ही धन्यवाद ना कहें लेकिन दिल में आभार का भाव जरूर रखते हैं. ठीक यही बात सॉरी के लिये भी लागू होती है.आपने कुछ गलत किया (जानबूझ कर या अनजाने में) और सॉरी बोल दिया. हो गया हिसाब बराबर.जब आप गलत काम कर सॉरी बोल देते हैं तो आप अपनी गलती पर विचार नहीं करते और फिर से उसी तरह की गलती करने के लिये खुद को स्वतंत्र पाते हैं. इसके बजाय यदि आप अपनी गलती पर विचारें और मन ही मन लज्जा का अनुभव करें तो बहुत संभव है कि आप उस गलती को दोहरायेंगे नहीं. 

जैसे हमारी पुरानी पीढियों में प्रदर्शन का उतना चलन नहीं था. तब पति पत्नी भी शायद जीवन भर एक दूसरे को “आइ लव यू” ना बोलते हों. लेकिन तब का प्रेम सही मायनों मे प्रेम था. जैसे जिम और डेला का प्रेम. जहां प्रेम आपकी जुबान पर नहीं होता वरन आपके एक्शन में,आपकी सोच में, आपके दिल में होता है. आज की पीढ़ी के लोग दिन में ना जाने कितनी बार आप “आइ लव यू” बोलते होंगे लेकिन फिर भी प्रेम की कमी है.किसी ने कहा भी है “सच्चा प्रेम वह है जब आप एक दूसरे को ये भी ना बता सकें कि आप एक दूसरे को कितबा प्रेम करते हैं “. प्रेम बताने का नहीं अनुभव करने की चीज है.पश्चिम में जहां लोग ना जाने कितने बार और कितने तरीको से “आइ लव यू” बोलते हैं फिर भी वहाँ का प्रेम कुछ कम ही लगता है.ये वहाँ होने वाले तलाकों से जाहिर होता है. इसीलिये शायद उन्हे वैलंटाइंस डे, फादर्स डे और मदर्स डे मनाने की जरूरत है. वो थैंक्स गिविंग डे भी मनाते है जहां वो ऑपचारिक रूप से लोगों को कार्ड्स वगैरह भेज के धन्यवाद ज्ञापित करते हैं.भारत में यह सब नहीं मनाये जाते…शायद इन चीजों की आवश्यकता ही नहीं है हमें.  

प्रश्न उठता है.क्या सदैव धन्यवाद या “आइ लव यू” कहने वाले पश्चिम के लोग भी आपस में उतना ही प्रेम करते हैं जितना भारत के धन्यवाद या “आइ लव यू” ना कहने वाले लोग?क्या वहाँ भी रिश्तों की गरमाहट उतनी ही है जितनी भारत में ? क्या धन्यवाद कहने वाले वो लोग एक दूसरे के प्रति उतने ही संवेदनशील है जितने भारत के लोग? दोनों समाजों के अध्ययन से ये बात साफ हो सकती है. लेकिन मेरा मानना है मुँह मे दिखावटी धन्यवाद की बजाय दिल मे धन्यवाद होना ज्यादा जरूरी है. हाँ दिल के साथ साथ ये मुँह पर भी आ जाये तो अच्छा है.लेकिन हम तो यही कहेंगे. “नो सॉरी ..नो थैक्यू ”

[मेरा यह मत चिट्ठों में टिप्पणी को लेकर नहीं है क्योकि में टिप्पणी को धन्यवाद का पर्याय नहीं मानता]

समीर जी के चिट्ठे पर राजीव जी की टिप्पणी भी विचारणीय है.

कहीँ पर मुझे विरोध लगता है

अमरीकी / भारतीय शिष्टाचार की तुलना बहुत जायज़ नहीं। भिन्न संस्कृति, भिन्न परिस्थितियाँ (सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक) तो उस पर यह तुलना और मापदण्ड भी उन्हीं के – फिर भी कम से कम सिद्धांत रूप में, कहीँ हम आगे तो कहीँ वे। हम किन्हीँ कार्यों में कर्तव्य और अधिकार समझते और देते भी हैं – वे किन्हीँ और कार्यों में । हम आज के आधा तीतर आधा बटेर भारतीय+पाश्चात्य समाज में ज़रूर दोहरी मानसिकता अपनाते हैं, तो गड़बड़ होती है, कौन से मानक लगायें? याद करें पिछले वर्ष 2006 जुन-जुलाई का रीडर्स डाइजेस्ट का शिष्टाचार सम्बन्धी सर्वेक्षण और उसमें प्रयोग किये गये बेतुके और पाश्चात्य मानक! जिनमें मुंबई को निम्न दर्ज़े का माना गया.

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: बहस, धन्यवाद संस्कृति, काकेश, मेरी बात

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

5 comments

  1. भारत के मूल संस्कार भी आत्मसात के हैं ना कि प्रदर्शन के.

    सहमति है। वस्‍तुत: टिपपणी के समर्थन में मुझे प्रोत्‍साहन का तर्क फिर भी वैध प्रतीत होता है इसलिए उचित जान पड़ता है कि नए लोगों को आरंभिक 4-5 पोस्‍ट तक इस तरह की टिप्‍पणी करें और उसके बाद तब कहें जब कहने की बात हो। और तब जरूर कहें

  2. यह भी एक नज़रिया है. बात भी सफलता से कही है.

    मगर अब धन्यवाद, मुआफी, प्रोत्साहन तो मानो जीवन शैली के अंग से हो गये हैं. शुरु में अजीब लगा भारत से आने पर, अब तो सोचना भी नहीं पड़ता.

    आप सही कह रहे हैं कि जिस वातावरण में हम रह रहे हैं वहाँ बातों को आत्मसात करते हैं, जो शायद ज्यादा अच्छी बात हो. मगर यदि कोई बात है तो कह देने में क्या हर्ज है. फिर वो चाहें पत्नी से कहना हो कि आई लव यू. प्रेम भले न बढ़े मगर कहने से कम तो नहीं होगा और वो भी खुश हो लेगी-जिसका हमेशा प्रयास रहता है. 🙂

    अच्छा विष्लेषण किया. पसंद आया. बधाई. यूँ ही जागरुकता बनाये रखें. स्वस्थ विमर्श हमेशा आवश्यक है.

  3. आपसे सहमत भी हूँ और नहीं भी। कुछ व्यक्तियों से जिनसे अधिक आत्मीयता है धन्यवाद, सॉरी आदि कहने की सचमुच आवश्यकता नहीं। लेकिन कुछ जगह जहाँ फॉरमल रिश्ते हैं वहाँ इन शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

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