ब्लौगिंग का उद्देश्य .. और अपनी पहचान..


आज कई दिन बाद फिर से अवतरित हुआ हूँ इस ब्लौग में… इस बीच ना जाने कितने नये ब्लौग आ चुके होंगे और नयी पोस्ट तो और भी ज्यादा होंगी ..लेकिन मैं कुछ भी पोस्ट करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था ..एक तो समय की कमी और दूसरी मन में ब्लौग को लेकर चलती उधेड़बुन.. पिछ्ली पोस्ट लिखी तो ज्ञानदत्त जी ने उसे ऑर्गेनिक कैमस्ट्री का नाम दिया था ..तब बात समझ नहीं आयी लेकिन उन्होने अपनी पोस्ट में उसे स्पष्ट करने का प्रयास भी किया . उन्होने कहा कि “काकेश; लगता हैं बड़े मंजे ब्लॉगर हैं। ” [इससे हमें आपत्ति है ..क्योकि पहले तो हम खुद को खिलाड़ी कहकर खिलाड़ियों का अपमान नहीं करना चाहते … हाँ भारतीय टीम के क्रिकेट खिलाड़ी कहते तब भी ठीक था और फिर मँजे हुए … मँजने के बाद ही धुलने का नम्बर आता है ..तो अब हमारी धुलाई होने वाली है उस बात से थोड़ा घबरा भी गये 🙂 ] …फिर जब उन्होने अपने जुनून की बात की तब टिप्पणीयों के द्वारा पता चला कि चिट्ठाकारी का कोई उद्देश्य भी होना चाहिये … हम तो यूँ ही चिट्ठाकारी करने में लगे थे कि मन हुआ तो कुछ लिख दिया नहीं तो पढ़ते रहो… टिपियाते रहो…लेकिन अब कोई कह रहा है कि कोई उद्देश्य भी होना चाहिये .. तो हम जैसे उद्देश्यहीन व्यक्ति क्या करें … ब्लौग लिखें या नहीं….??

फिर कुछ दिन पहले एक चिट्ठाकार से बात हुई तो यूँ ही जब उन्हे हमारी उम्र पता लगी तो कहने लगे ..अरे आप इतने बड़े हैं आपके लेखन से तो लगता था कि आप कोई 20-25 साल के ही होंगे… अब इसमें वैसे खुश होने की बात तो थी नहीं कि मेरे चेहरे से मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता टाइप … क्योंकि उनसे तो सिर्फ वर्चुअल मुलाकात हुई थी … हम सोचे कि हम इतना घटिया लिखते हैं इसीलिए इन महाशय को लगा होगा कि कोई पढ़ा-लिखा समझदार परिपक्व आदमी तो ऎसा लिख ही नहीं सकता ..वैसे यहां ये भी बता दें कि हम पढ़े,लिखे,समझदार,परिपक्व हैं भी नहीं … इसलिये कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई..उलटे अच्छा ही लगा …

फिर जब निर्मलानंद जी से मिले तो वो बोले अरे आप तो इतनी कम उम्र के हैं ..हम तो आपको ..खैर उन्होने जो भी कहा वो उसका बिल्कुल उलटा था जो पहले चिट्ठाकार ने कहा था… मेरी उधेड़बुन और बढ़ गयी .. आजकल प्रमोद भाई अपने को पहचानने की बात करने लगे हैं… और आज ज्ञानदत्त जी ने भी एक तरह की पहचान की बात छेड़ दी …मेरा तो कनफ्यूजन बढता ही जा रहा है … मैं अनेक सवालों से दो चार हो रहा हूँ ..क्या मेरा लेखन (ही) मेरी पहचान नहीं है ? क्या किसी के लेखन से उसकी उम्र और उसके व्यक्तित्व का पता चलता है ..या फिर चलना भी चाहिये क्या ?? क्या एक ही तरह का लेखन दो अलग अलग व्यक्तियों को दो अलग अलग अर्थ दे सकता है ? यदि हाँ तो क्या इसमें लेखक का दोष है या फिर पढने वाले का या कि किसी का नहीं… क्या व्यक्ति के विचार समझने के लिये व्यक्ति को जानना आवश्यक है .. ?? ज्ञानदत्त जी ने कहा ” लोग ब्लॉग पर अपने प्रोफाइल में आत्मकथ्य के रूप में हाइपरबोल में लपेट-लपेट कर न लिखें. अपने बारे में तथ्यात्मक विवरण दें. अपने को न तो महिमामण्डित करें और न डीरेट ” वो लोग जिंन्होने अपने प्रोफाइल में कुछ नहीं लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा है तो उससे उनका लेखन अच्छा या बुरा हो सकता है ..??

मैं इन्ही प्रश्नों से दो चार होता हूं ..आप कुछ सुझायें ताकि हम कुछ नया लेकर आपके सामने आयें…

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By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

17 comments

  1. भाइ लोगो की राय से चलोगे तो फ़स जाओगे,अपना जीना अपनी मर्जी पर ,एक गांव मे एक बंदा छत से गिर गया भिड एकट्टःई हो गई,लोग कहने लगे हाथ टूटा है क्या,पैर मे लगी है क्या,वो बंदा लोगो की राय मे यकीन करता था बोला भाई जहा पाच पंच कह देगे वही मान लूगा कि टूट गया है

  2. लिखते रहें, बिना उलझन के. यही ब्लोगैंग का मूलमंत्र है. 🙂

  3. बिना अनुवाद के ही ….आपके लेखन से लगता है अंग्रेजी समझते हैं…. :))
    I write for very much the same reason I read: to startle my mind, to churn my heart, to tingle my spine, to knock the blinders off my eyes and allow me to see beyond the pale. I write for the specific and unique ways that words can evoke emotions and images and thus give both pain and pleasure, wonder and confirmation about what it means to be alive.
    Amy Tan, 1996

  4. भैया हम तो लिखते हैं क्‍योंकि बस…लिखते हैं। रहा उद्देश्‍य…उसकी चिंता न करां ज्ञानी लोग उसमें कुछ न कुछ खोज ही लेंगे।
    लिखते रहो – लिखते रहो

  5. मैं कुछ बोलना चाह रहा था.. लेकिन बेजी की अंग्रेजी देखकर भटक गया हूं.. भूल रहा हूं ठीक-ठीक कहने क्‍या आया था.. हां, लेखन तो पहचान नहीं ही हो सकती.. हो सकती तो गुलज़ार साहब के लिरिक्‍स में ‘लेखन’ की बात होती.. न कि ‘आवाज़’ की.. जैसाकि वास्‍तव में है- भूपिंदर वाला ‘किनारा’ का वो गाना याद करें- ‘नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा.. मेरी आवाज़ ही पहचान है आदि-आदि’.. मुझे लगता है इस संबंध में प्रत्‍यक्षा जैसे गुलज़ार एक्‍सपर्ट ब्‍लॉगरों की भी राय लेनी चाहिए.. लेनी ही नहीं चाहिए.; गौर भी करना चाहिए.

  6. लेखन से व्यक्तित्व की झलक मिलनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा हो रहा है तो समझिए कि आप ईमानदारी से अपनी बात अपने पाठकों तक रख पा रहे हैं। उम्र वाली बात ज्यादा मायने नहीं रखती ।

  7. It is better to get confused than not to think at all.
    It is better to get questions. One may or may not get answers.
    Read Prashnopnishad. If you are not getting bored already! 🙂

  8. देखिये यहां तो लोग इसी फिक्र में दुबले होते रहते हैं कि उसकी कमीज मेरी कमीज से ज्‍यादा सफेद कैसे। लिखते रहें। हर लेखन का कोई न कोई मकसद होता है। दिल में जो आया लिख डाला। …पर दिल में कोई खास बात ही क्‍यों आयी…

  9. हाथ है, उंगलियाँ हैं, एक कमप्यूटर है और नेट भी जुड़ा है अतः लिख रहे हैं, लिखते रहेंगे ।
    घुघूती बासूती

  10. मस्त रहिए, लिखते रहिए।

    एक ब्लॉग ही तो ऐसी चीज है जिसे लिखने में दिमाग का इस्तेमाल करने की जरुरत नहीं। 🙂

  11. भाई साहब आप खुद उलझ गए हैं या हमें उलझा रहे हैं। इतना सोच विचार किसलिए, यहाँ तो लोग वैसे आँय-बाँय-शाँय लिखते रहते हैं। अरे हमने कभी आपसे पूछा कि आप किस उद्देश्य से ब्लॉग लिखते हैं? 🙂 आप तो कीबोर्ड घिसो (जैसे पहले लोग कलम घिसते थे) और आपके लिखे हुए में सब अपने अपने उद्देश्य ढूँढ लेंगे।
    ब्लॉग लिखते समय और टिप्पणी करते समय भी अपना अमूल्य मस्तिष्क अलमारी में रख दें (बंदर और मगर की कहानी सुनी या नहीं, हाँ वही जिसमें बंदर अपना कलेजा पेड़ पर रख देता है) और बेफिक्र होकर खटर-पटर करें कीबोर्ड पर 🙂

  12. मेरे खयाल से हम जब कोई एक चिट्ठा डालते हैं, तो उस वक्त कोई ना कोई मकसद जरूर होता है, पर जरूरी नही कि सभी पाठक उसे आपके नजरिये से पढे, किसी-किसी को वह विषय मकसद-विहीन भी लग सकता है। जो भी हो मै तो तब लिखती हूँ, जब विषय अंतःकरण मे उतर आया हो, और उस पर भी खाली बैठी हूँ, मेरा मकसद इतना भर होता है कि, कभी मै भी अपने भावो को अच्छे तरीके से रखना सीख ही जाऊँगी :D|

    जहां तक उम्र की बात है, इसका अन्दाजा नही लग सकता, क्यूँकि हम सब एक पल से दुसरे पल मे अलग अलग उम्र के होते है। यकिन नही होता तो कभी शाम गये बैठे के सोचने पर समझ मे आयेगा कि आप दिन भर जिन जिन से मिले, जो जो काम किया, वो सब एक ही आदत और भावना के साथ हुआ?

    एक ही इंसान पुरे दिन कई रूपो मे होता है, जब जिस रूप मे बैठकर वो लिख रहा होगा, उसके लेख उसी के सदृश्य होंगे।

    लगता है ज्यादा हो गया… अभी चलती हूँ.. टाटा

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