परुली:ब्या टालने की उहापोह

परुली के बाबू रात को ठीक से सो भी नहीं पाये. रात भर सोचते रहे कि क्या किया जाये. एक ओर वह चाहते थे कि परुली डॉक्टर बन जाये और दूसरी ओर वह परुली के लिये इतने अच्छे संबंध को छोड़ना भी नहीं चाहते थे. यदि वह किसी तरह अपने मन को इस बात के लिये तैयार भी कर लेते कि वह परुली का ब्या अभी ना करें तो वह किस तरह से इस संबंध के लिये मना करेंगे. एक बार बिरादरी में बदनामी हो गयी तो लोग तरह तरह की बातें बनायेंगे. फिर आगे भी रिश्ते नहीं आयेंगे.इसी तरह सोचते सोचते सुबह हो गयी. घर में घड़ी तो थी नहीं. पास के शहर में एक जेल था उसमें हर घंटे घंटी बजायी जाती जिससे समय का पता चलता. अभी अभी पांच घंटे बजे तो जोसज्यू उठ गये. आज उन्हें बगल के गांव में एक जजमान के वहाँ नामकन्द (नामकरण) करवाने जाना था.

आते समय जाखनदेवी में उपाध्याय ज्यू की दुकान में बैठना जोसज्यू का लगभग रोज का ही नियम था. कभी कभी वह पास की ही भोलदा की दुकान से एक पान भी खा लेते. लेकिन उपाध्याय ज्यू की दुकान से उधार में सामान लेने के अलावा वह उन्हें अपने घर की बातें भी बता आते.उपाध्याय ज्यू जानते थे कि परुली का ब्या ठीक हो गया है. इसलिये आज जोस्ज्यू ने सोचा कि इस बारे में एक बार उपाध्याय ज्यू से भी सलाह कर ली जाये.

“आओ हो जोस्ज्यू ..आज कांबटी (आज कहाँ से) “

“बगल के गांव में खीमदत्त ज्यू के वहाँ नामकन्द था हो.”

“खूब माल-टाल मिला होगा तब तो. खीमद्त्त ज्यू का तो पांच नातनियों के बाद नाती हुआ ठहरा. खूब झर-फर कर रखी है बल.”

“हाँ पूरे गांव को खाने का न्यूता था. हमारे तो पुराने जजमान हुए क्या माल-टाल देंगे. हाँ इस बार सवा रुपये की जगह सवा पांच रुपये की दक्षिणा दी हो.”

“भल हुआ यह तो.तब तो चहा बढ़ूं पे मैं.”

“हाँ बढ़ांओ……कुछ रुककर ….उपाध्याय ज्यू..एक बात में आपकी राय लेनी थी हो.”

“क्या…चाय की केतली में पत्ती डालते हुए उपाध्याय ज्यू बोले. “

“परुली के बारे में….”

“अरे उसके ब्या में कुछ रुपये पैसे की मदद चाहिये क्या. “

“नहीं ..वो तो नहीं …पर परुली कह रही है वह यह ब्या नहीं करेगी. वह पहले डॉक्टर बनना चाहती है. “

“अरे वह तो नानतिन ठहरी.उसका क्या. आप तो ब्या कर दो जी. बनना होगा तो बन जायेगी.”

“लेकिन यार …चाहता तो मैं भी हूँ कि वह डॉक़्टर बन जाये.इसलिये सोच रहा हूँ कि इस ब्या को अभी रुकवा दूँ.”

“जोस्ज्यू तुम्हारी तो मति मारी गयी है.इतना अच्छा घर कहाँ मिलेगा परुली को. चिंन्ह भी कैसा बढिय़ा साम्य हुआ ठहरा. शादी ब्या तो अंजल (संजोग) की बात होने वाली हुई. पहले तो डॉक्टर बनना ही कितना मुश्किल हुआ फिर परुली को डॉक्टर बना भी लिया तो कौन सा उसको जनम भर अपने घर में रख लोगे. ब्या तो तब भी करना ही पड़ेगा ना.फिर अभी बिना किसी कारण के ब्या रोक दिया तो तुम्हारे जजमान ही क्या कहेंगे. कस बामण छा हो तुम ?(कैसे ब्राह्मण हो हो तुम?) …. लो चहा पियो.”

चहा पीते पीते जोसज्यू ने भविष्य की सभी संभावनाओं पर विचार किया. उनको सचमुच अपने जजमानों और बिरादरों की बातें सुनायी देने लगी.बदनामी के डर से वह थोड़े घबरा गये.लेकिन साथ साथ ही जब वह परुली के बारे में सोचते कि जब उसने कहा था ” बाबू मैं यह ब्या नहीं करुंगी” तो कितनी इच्छाऐं उसके एक वाक्य में छिपीं थी.वह कुछ भी निर्णय ले पाने में असमर्थ थे. 

घर जाके भी वह परेशान ही थे. परुली उनके सामने से गुजरी तो उसकी आंखें लाल थी.लगता था वह खूब रोयी है. अब तक उन्होने ध्यान नहीं दिया था. लेकिन अब वह सोच रहे थे कि जब से परुली के ब्या की बात शुरु हुई तब से वह उदास ही रहती थी. इसका कारण अब उनकी समझ में आ रहा था.वह परुली का बुरा थोड़े चाहते थे लेकिन वह क्या कर सकते थे.जिससे भी वह बात करते वह यही सलाह देता कि परुली का ब्या कर दो.

उन्होने निर्णय लिया कि कल वह मलगाड़ जा के एक बार पांडे ज्यू से बात करेंगे. वह भले आदमी हैं हो सकता वही कोई सलाह दें. यदि वह खुद ही परुली को डॉक्टरी पढ़ाने के लिये राजी हो जायें तो फिर परुली का ब्या भी हो जायेगा और वह डॉक्टर भी बन जायेगी. अपनी इस सोच से वह खुद भी हैरान थे कि पहले यह विचार क्यों उनके दिमाग में नहीं आया.आज वह जल्दी जल्दी खाना खा के सो गये ताकि वह कल रत्तब्याण ही मलगाड़ के लिये रवाना हो जायें.

जारी……..

पिछले भाग : 1. परुली…. 2. परुली: चिन्ह साम्य होगा क्या ?? 3. परूली : शादी की तैयारी 4. परुली:आखिर क्या होगा ? 5. परुली: हिम्मत ना हार ..6. परुली : ब्या कैसे टलेगा

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पिछ्ले अंक में मैने बताया था कि आज वाले भाग में कहानी का अंत कर दुंगा. एक अंत सोचा भी था.लेकिन मुझे खुद भी लग रहा था वह कुछ कुछ फिल्मी अंत हो रहा है  और फिर  पिछ्ले भाग में आयी टिप्पणीयों से हौसला मिला कि मुझे कहानी का अंत फिल्मी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. आज सुबह लिखने बैठा तो इसी उहापोह में रहा कि कहानी का अंत करूं या फिर इसे इसी रफ्तार से आगे बढ़ने दूँ. कही ऐसा ना हो कि लगे कि कहानी जबरदस्ती खींची जा रही है. फिर लिखते लिखते लिख ही गया. अभी लगता है कि कहानी जारी रहेगी. तो अगले हफ्ते भी आइयेगा पढ़ने.

कल कुमांऊनी होली का अगला अंक प्रस्तुत किया जायेगा कृपया जरूर पधारें.

1. कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग 2. कुमांउनी होली: भक्ति भी,अश्लीलता भी

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

25 comments

  1. मलगाड़ क पांडे ज्यू आब सब्बै तुमार हाथ मैं छ! गोलज्यू दैन होया, पांडे ज्यू के भलि मत्ति दिया!!!

  2. यूं तो कहानी अच्छी चल रही है पर आज का अंश कुछ ज्यादा नही जमा। बुरा मत मानिएगा।

    [काकेश ने कहा: ममता जी आपने अपनी भावना बताई इसमें बुरा मानने जैसा तो कुछ भी नहीं है. आपका शुक्रिया बताने के लिये. अगले हफ्ते थोड़ी और मेहनत करुंगा.आप आयेंगी ना ..]

  3. Dear Kakesh Da,
    Sahi Ja rahe ho Kahni bhi sahi ja rahi hai mane pahle bhi comment kya tha ke Agar Kahni ko Aap Apne Anusar Na Lik Pao to maja nahi Aayega ……….. Isliya Janat ki Pasand se nahi Apni Kanhi ko apne Andaz mai Likate Jao…………Sahi Ja rahi Hia Kahani Or Maja Bhi Aa raha hai kam Se kam Kyon Ki Sas Bhi Kabhi Bahu Wale seriale ki tarha to nahi jab Janta ne kha Jinda Kar Do jinda Kar diya or Ant mai Is Natak ke Rating girti Gaye……….
    Is liya mera Aap se kahan hai Ki Likate Raho Hum Padte Rahenga ………. Bahut maja Aa Raha Hai Or Next Wednesday ka Wait Rahega…………….. Jai Uttrakhand………..Jai Bharta……..

  4. मेरे विचार से आप हमारे विचारों पर ध्यान न दें । लिखते समय पाठकों को भूल जाइये । 😀
    घुघूती बासूती

  5. Kakesh bhai,
    Maja aa gaya jakhandevi ki upadhyay ji ki chai aur bholda ke pan ki bat padh kar…Fir se almora ki yad taja ho gayi…
    Bilkul sahi ja rahe ho…keep it up, bahut utsukta ho rahi hai aage ki kahani ke bare mai…
    Dhanyad,
    kiran

  6. Namaskar kakesh jee,

    Sab khuch theek thaak jaa raha hai, lekin ek baat kahni hai, kee aap thoda jyada pahadi shabdon ko use karen, kahin, kahin per pure hindi sentence dhek kar boora lagta hai,

    Naveen

  7. Kahani bahut achhi ja rahi hai.Kumaoni shabdon ka prayog kahani ko sashakt bana raha hai aur Sailesh Matiyani ya Phanishwar Nath Renu ki anchalik kahaniyon ka maza de raha hai. Mere Poore parivar ko agli kadi ka intzaar rahata hai.

  8. अंत ने उत्सुक कर दिया है . अब इंतज़ार रहेगा कि सुबह परुली की बाबा पांडे ज्यू से कैसे बात करेगे.

  9. सबै पहाङी दगङियाँ और काकेश दा केँ नमस्कार,
    कहानी तो बहुतै भलि लागमै, वू है बै लै भ्वल लागोँ जब हमार दगङि आपण भ्वला-भ्वल कमेँट दिनी..
    पछिन हफ्त बै मकै कुछ उम्मीद हमै कि शायद परुली आब डा.प्रिया बनी जैँ..
    देखो गोल ज्यु के करनी…
    काकेश दा,एक गुजारिश छू कि तुम जो लै वाक्य लिखम छा, वुकै पहाडी मेँ जी लिखो.. म्य खयालल पहाङी दगङियाँ केँ समझ ऐ जाल, चाहे कहानी हिन्दी मी सही..

  10. Good Story, go ahead, goining rightly.
    Please use more kumaoni words which creat interest for learning and right pronounciation of kumouni.

    Ramesh Bhatt

  11. फिर क्या हुआ? जारी रखे ं हम पढ रहे हैं…..

  12. bahut sunder kahani chh.ummeed karte hain ki kahani ka ant madhyakaleen na ho aur aaj ka mutabik jo bhi sambhawanein hai unko dyan mein rakh kar kahani chalti rahe
    yes i congratulate you to use your own owned words (kumauniwords), which enhance taste of reading.
    keep it high
    RRS

  13. Hii i got this link from one of my friend in UK and i found this story very intersting, this is really a good approach that we kumounies are looking forward and making our own way.I found this story very intersting.Good going

    C

  14. Hii i got this link from one of my friend in UK and i found this story very intersting, this is really a good approach that we kumounies are looking forward and making our own way.I found this story very intersting.Good going and it would be a good idea to have more kumouni words in the story.

  15. bahut sunder kahani chh.ummeed karte hain ki kahani ka ant madhyakaleen na ho aur aaj ka mutabik jo bhi sambhawanein hai unko dyan mein rakh kar kahani chalti rahe
    yes i congratulate you to use your own owned words (kumauniwords), which enhance taste of reading.
    keep it high

    thanks

    laxman kathait

  16. बहुत अच्छा लिखा है । साधुबाद काकेशजी !
    डोट्याल होनेके नाते से कुमायु का ये परिबेश मनको छु गया । keep it up.
    मै काठमाण्डौ से आपका ब्लाग पढता रहुगा ।लग रहा है मै मेरे गांव से गुजर रहा हु ।
    लिखते रहियेगा । धन्यबाद

  17. Anchalik or new stories being written in Hindi fiction primarily reflect a perceptible shift in terms of emphasis and the selection of the subjects to be used in such stories. Though it might also be seen as an extension of the Premchand tradition whose specific domain was the delineation of the subaltern. The new story in Hindi reminds us of the tales of the social tension and the dynamics of a caste ridden society . Maitri Pushpa, Kamleshwar,Alka sauragi,Yashpal and vinod kumar shukla are acclaimed exponents of this specific concern that mainly examines the disintegration of the human soul in a society rooted into fragmentations based on the human divide and the realistic operative bias in the conduct of the human race.

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