पत्रकार यूँ बने ब्लौगर !!

यह चिट्ठा 22 मार्च 2007 को यहाँ प्रकाशित किया गया था।

ब्लॉग की दुनिया बड़ी निराली है। जब आप विवादित हों तो आपको हिट्स भी मिलती हैं और प्रतिक्रियायें भी। जब आप एक भाव पूर्ण कविता लिखो तो आप को कोई नहीं पूछता -हां गिरिराज जी प्रशंसा करते हुए नाम के आगे प्रश्न चिन्ह जरूर लगा देते हैं। अनामदास जी कहते हैं कि “ब्लॉग” को उलटा करो तो “ग्लोब” जैसा कुछ बनता है। तो क्या ब्लॉग हमारी दुनिया या समाज का आईना है जहां जो “बिकता है वो दिखता है”? अब हमने (संजय भाई ने कहा है .. कि हास्य व्यंग्य में ‘हम’ चलता है ‘मैं’ नहीं) भी सोचा कि बेजी जी ने जब लिखा पत्रकार क्यूँ बने ब्लौगर ?? तो उन्हें खूब हिट्स मिले और उसी प्रश्न को जब यहां उठाया गया तो बहुत प्रतिक्रियायें भी आ गयीं …. तो हम भी कुछ लिख डालें ताकि हमें हिट्स भी मिलें और प्रतिक्रियायें भी ( अब नीरज भाई आप फिर से ‘परिचर्चा‘ का रास्ता ना दिखायें …लोगों को करने दें प्रतिक्रियायें )। तो हमने भी उसी यक्ष प्रश्न को अपने अंदाज में टटोला तो ये पाया।

पढ़िये ‘सेवन रीजन्स फॉर बिकमिंग हाईली इफेक्टिव पत्रकार-ब्लौगर‘

1.काम की कमी: पत्रकारों के पास काम की निहायत ही कमी होती है। कभी कभी तो इस कमी से मानसिक तनाव तक हो जाता है। इसी तनाव से उबरने के लिये ये लोग ब्लॉग का रास्ता अपना लेते हैं।

2.कमेंट्स पर भी अपने कमेंट्स: हम जैसे ‘नॉन पत्रकार” को एक चिट्ठा लिखना भी भारी पड़ता है या फिर कोई विषय नहीं मिलता और ये लोग काम की कमी के मानसिक तनाव की वजह से कमेंट्स पर भी अपने कमेंट्स देकर अपना चिट्ठा बना लेते हैं।

3.पाप पुण्य और पैसा: पत्रकार को पाप पुण्य का बहुत ज्ञान होता है वो जानता है कि यदि कुछ पाप हो भी गया तो उसे कैसे दूर करना है…इस लिये वो ढेरों पाप करता है (ब्रेकिंग न्यूज के लिये) –“बिना पाप पैसा कहां”- और फिर कहता है “पाप से नहीं स्नान से डरो” .. वैसे भी टी.वी. पत्रकार जिसका थोबड़ा भी टी.वी. में आता है उसे सुन्दर दिखने के लिये हर रोज नहाना पड़ता है (कभी कभी तो सर्दियों में ठंडे पानी से भी) तो वो तो वैसे भी स्नान से डरता ही है।

4.खाक छानता पत्रकार: पत्रकार को न्यूज के लिये जगह जगह की खाक छाननी पड़ती है। इसलिये जब वो ब्लॉग लिखने के लिये बिना खाक छाने कोई न्यूज लिखता है तो उस माहौल को ‘मिस’ करता है इसलिये उनके ब्लॉग्स के नाम होते हैं ‘मोहल्ला’ ,‘कस्बा’ , ‘दिल्ली-दरभंगा’ … वैसे आगे आने वाले पत्रकारों के लिये ‘गली’ , ‘बाजार’ , ‘शहर’ , ‘राज्य’ , ‘नुक्कड़’ , ‘गुमटी’ ,’रतलाम-मोतिहारी’ जैसे नाम सुरक्षित हैं।

5.टाइपिंग की टीस: टाइपिंग और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ है। जैसे कि अनामदास जी कहते हैं कि “कीबोर्ड की खाता हूँ, उसके बिना मन नहीं लगता। हर काम आराम से करता हूँ, बस धीरे-धीरे टाइप नहीं कर सकता।” हमारे यहां तो उलटा ही है “बीबी की खाता हूँ (डांट), उसके बिना मन नहीं लगता। हर काम तेज-तेज करता हूँ, बस तेज-तेज टाइप नहीं कर सकता।” इसलिये पत्रकार फटाफट चिट्ठे लिखें तो क्या अचरज।

6.चक्कर चालीस से चौदह का: पत्रकारों के शौक बड़े निराले होते हैं। शराब और सिगरेट इनके अच्छे साथी होते हैं (ये मैं नहीं कह रहा अनामदास जी ने कहा “बाकी कुढ़ते हैं या शराब में बूड़ते हैं” ). लेकिन कभी कभी कोई गलती से पीना छोड़ भी दे (थोड़े दिनों के लिये ) तो वो उस पर भी चिट्ठा लिख डालता है और पहुंच जाता है सीधे दौड़कर चालीस से चौदह में..!

7.महान बनने का शौक: य़े बात तो सही है कि पत्रकारों के पास एक बहुत बड़ा बाजार है लेकिन वो जानते हैं कि “बाज़ार केवल धनवान बना सकता है, महान नहीं!” इसी महान बनने के चक्कर में वो लोग ब्लॉग लिखते हैं..कि शायद…( अब इस से कोई ये मतलब ना निकाल ले कि ब्लॉग लिखने वाला महान होता है। )

डिसक्लेमर : ये सारा चिट्ठा मैं अपने पूरे होशोहवाश में लिख रहा हूँ। यहां किसी व्यक्ति विशेष की ना तो आलोचना है ना सराहना .इसलिये कृपया चप्पल, जूते ना मारें। मारने का इतना ही शौक है …तो फिर कमेंटस मार लें।

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

15 comments

  1. सही लिखे हो, इसको पत्रकार पुराण के नाम से पंजीकृत करवा लो। क्या पता कल को कोई आइडिया ही चुरा ले।

    अच्छा लिखा है, पढकर मजा आया। आगे के लेखों का बेसब्री से इन्तज़ार रहेगा।

  2. बहुत सारे चकरम एक साथ घुस आए हैं ब्लॉग जगत का उद्धार करने के इरादे से . और यहां कोई भाव नहीं दे रहा है . इसी बात की तकलीफ़ है. रोज़ एक नया फ़ंडा या हथकंडा लेकर आते हैं . ऊधौ की तरह ज्ञान की गठरी लादे हैं . खड़े हैं किसी भारवाही की तरह . और ब्लॉगर-गोपियां हैं कि चितवन भी नहीं मार रहीं हैं . उनका लक्ष्य तो और ही है. इन पत्रकारों-मीडियाकारों ( मीडियॉकरों भी कह सकते हैं )ने तमाम तरह के द्रविड़ प्राणायाम कर लिए . मिली-भगत के सारे जतन कर लिये . पर दुकानदारी जम ही नहीं रही है . इनकी समस्या यह है कि ये अपने अलावा सभी को कमतर आंकते हैं.यही इनके दुखों और ‘फ़्रस्ट्रेशन’ का मूल कारण है .

  3. भई आप भी पढ़े लिखे और समझदार हो कर भी वही ग़लती कर रहे हैं जो इस प्रकरण में अधिकतर लोग कर रहे हैं.. पत्रकार जो कुछ अपने अखबार या चैनल पर लिखता बोलता है वो सिर्फ़ उसकी नौकरी है.. वो उसकी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी नहीं है..प्लीज़ समझिये इसको.. ये उस व्यक्ति का बड़ा दर्द है.. आप लोग बार बार उस पर पत्थर मारे चले जा रहे हैं.. तुम को ये बोलने का हक़ नहीं तुम तो अपने चैनल पर ये करते हो वो करते हो.. बड़े पाप करते हो.. अरे भाई वो भी बेचारः अपना पेट पाल रहा है.. जीने दें उसे भी..

    बाकी आपका अंदाज़ बढ़िया है रोचक है मज़ेदार है..

    एक बात और ..मैं पत्रकार नहीं हूँ..

  4. बढि़या है। इसको तो सही में सजा के रख लो!वैसे पत्रकार लोग अपनी राय बता दें तब करना ये सब!

  5. आपने बिल्कुल सही नब्ज़ पकड़ ली,पाठक क्या पढ़ना चाहते हैं बहुत जल्दी जान गये और नतीजा देखिये ११ वीं टिप्प्णी!!! जो कि कईयों को को नहीं मिल पाती। 🙂
    लगे रहो……:)

  6. बहुत खूब काकेश जी धांसू लेख, लगे रहिए।

    @चौपटस्वामी,
    चौपटस्वामी जी आप लगता है ब्लॉगजगत पर काफी दिनों से निगाह रखे हैं। एकदम सही नस पकड़ी।

  7. Kakesh ji kamaal ka likha hai, lekin ravish ji aur aapke is post se main katai sahmat nahi hu. Ek patrkaar hone ke naate main ye kah sakta hu ki logo mein kaam ki bhavna nahi rahi, log chaaploosi karne mein lage hain. Karne ko to bahut kuch hai. 8-10 ghante ki duty mein log gappe jayada kaam kam karte hain. Koi kaam ke bhoj se daba ja raha hai to koi 🙂 🙂 🙂 karne mein laga hai. Jara aas paas dekh le. Aapko bhi dono tarike ke kai log mil jayenge.

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