धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. देश के खाये पिये लोग खुश हैं.वे ठंड का इंतजार करते हैं. ठंड उन्हे अच्छे कपड़े पहनने का अवसर देती है. ठंड में आपकी पाचन क्षमता बढ़ जाती है तो कुछ लोग इसी को और अधिक खाने का अवसर बना लेते हैं.वैसे खाने वाले लोग किसी भी मौसम में खाने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं. जैसे पीने वाले लोग किसी भी अवसर पर पीने का बहाना ढूंढते हैं. खाने-पीने वाले लोग हर मौसम को एक दृष्टि से देखते हैं पर ठंड उन्हे अपनी दृष्टि को और व्यापक बनाने की प्रेरणा देती है. कुछ अपने बढ़े हुए वजन से इसी ठंड में निजात पाना चाहते हैं. ठंड बहुत अच्छी है जो हमें इस तरह के अवसर देती है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.वो लोग जो अभी तक किसी भी फुटपाथ,किसी भी डिवाइडर या किसी भी पुल के नीचे चैन से सो जाते थे उन्हे अब नया घर तलाशना होगा. वो अधनंगे लोग जो किसी तरह से गुदड़ियों में अपनी इज्जत बचाये घूम रहे हैं उन्हे अब इज्जत के साथ साथ खुद को भी बचाना होगा. ठंड उनके शरीर पर अब फिर से वार करेगी वैसे ही जैसे पिछ्ले कई सालों से कर रही है.वैसे ही जैसे कुछ दिनों पहले तक सावन कर रहा था , बारिश कर रही थी , बाढ कर रही थी. उन्हे फिर से रात भर जागना होगा,सुबह कोई काम तलाशने से पहले.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है. बजार में कितनी नई नई तरह के गरम कपड़े आये हैं. नये तरह के कोट , जैकेट , उनी स्वेटर , मफ़लर , टोपी और भी ना जाने क्या क्या. लोग ठंड के लिये अभी से खरीदकारी करने निकल चुके हैं. अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर आज वो कोई इम्पोर्टेड जैकेट लेने की सोच रहे हैं.टोपी से सर को ढंककर,मफ़लर से कानों को ढंककर वो जब ऑफिस को निकलेंगे तो कितना मजा आयेगा.पिछ्ले साल उनको इस तरह देख कर मुन्नू कितने तो प्यार से बोला था ‘पापा आप तो बिल्कुल उल्लू लग रहे हैं’ और वो कितने खुश हुए थे, असली मजा तो ठंड का ही है. देश प्रगति पर है. गीजर के गरम पानी से नहाने का सुख तो आप ठंड में ही उठा सकते हैं.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.कुछ लोगों की चिंताऎं भी इसके साथ साथ बढ़ने लगी है. अपने चार महीने के बच्चे को इस ठंड से बचाने के लिये वो अधनंगी औरत चिंतित है. वो दो साल पहले की घटना को दुहराना नहीं चाहती जिसमें उसका एक बच्चा इसी तरह की ठंड की भेंट चढ़ गया था. वो कपड़े इकट्टा कर रही है.कुछ पुरानी फटी धोतियां शायद उसकी मालकिन दे देगी. वो इस बार मालकिन को बोलेगी कि कोई पुराना ऊनी कपड़ा भी दे दे.वो ठंड के बारे में सोच कर दुखी हो रही है. सुबह सुबह ठंडे पानी से रात के जूठे बर्तन बर्फ जैसे ठंडे पानी से जब वह मांजती है तो पूरा शरीर सिहर जाता है. हाथ अकड़ जाते हैं. लेकिन उसे मालकिन के उठने से पहले बर्तन मांजने होंगे नहीं तो कहीं मालकिन नाराज होकर हमेशा की तरह चिल्लाने लगेंगी तो फिर उसे ऊनी कपड़े नहीं देंगी.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.गाजर का हलवा,गजक,मूंगफली आहा ये सब ठंड के ही तो तोहफे हैं.गुनगुनी रजाई के अन्दर बैठकर प्लाज्मा टी.वी पर पिक्चर देखना कितना सुखद है. जिनके शरीर पर स्वेटर है,जेब में पैसे है, खाने का पर्याप्त स्कोप है उसे ठंड से खूबसूरत कोई मौसम नहीं लगता. वह इस मौसम में कविता भी करता है. बिरयानी और व्हिस्की की पर्याप्त व्यवस्था होने पर इस ठंड के ऊपर किसी भी कॉंफ्रेंस में भाषण भी दे सकता है.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.हमेशा की तरह रात सिर्फ सुबह उगने वाले सूरज की आशा में काटी जायेगी.वही सूरज, जिसे गरमी में जी भर कोसा करते थे ,अभी एकमात्र सहारा है.घुटनों को छाती से चिपकाकर बैठने से ठंड को कम करने का प्रयास किया जायेगा.एक अदद अलाव जलाने के लिये सूखी लकड़ियों की तलाश की जायेगी. कड़कड़ाती ठंड का किटकिटाते दांतो और बंधी हुई मुट्ठी के जरिये ही सामना करना होगा. वो प्रार्थना कर रहे हैं कि काश इस बार फिर चुनाव हो जाते. दो साल पहले जब चुनाव हुए थे किसी नेता ने कंबल बांटे थे.वो कंबल कितने अच्छे थे वो नेता कितना अच्छा था. सुना है वो जीत गया इसीलिये तब से दिखायी नहीं दिया. खैर चुनाव हो जायें तो वो फिर आयेगा और कंबल बांटेगा.

धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.एक ही मौसम कितने रूप दिखाता है ना. दोष किसका है क्या मौसम का ?

चिट्ठाजगत चिप्पीयाँ: हास्य व्यंग्य, काकेश

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

12 comments

  1. सर्दी गरीबों के लिये अभिशाप है। एक एक लकड़ी का टुकड़ा बीनते देखा है मैने कुहासे भरी ठण्ड में उन औरतों को। ठिठुरता बदन। हड्डी और चमड़े के बीच कोई परत ही नहीं जो सर्दी को हड्डियों तक जाने से रोके।
    पर शायद सर्दी नहीं; गरीबी अभिशाप है।

  2. धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है…सच में. इतना बेहतरीन लिख रहे हो कि लग रहा है -धीरे धीरे ठंड बढ़ने लगी है.

  3. “वो प्रार्थना कर रहे हैं कि काश इस बार फिर चुनाव हो जाते. दो साल पहले जब चुनाव हुए थे किसी नेता ने कंबल बांटे थे…”
    यही तो बात है। अपने यहां इतने संसाधन हैं कि सत्ता जवाबदेह हो जाए तो सभी का ख्याल रखा जा सकता है। किसी के ठंड में कंपकंपाने की नौबत ही नहीं आएगी। काकेश भाई, इस पोस्ट में कविता जैसी संवेदना है और सुंदर फोटोग्राफी का contrast है।

  4. जिसे गरमी मे एसी मिल जाता हो,सरदी मे हीटर ,दोस्त वो कैसे जानेगा उस दर्द को जिसका परिवार गरमी मे लू से गुजर गया हो हो और अब सर्दी मे ठंड से मरने को तैयार बैठा हो..
    या शायद ये सरदी भी गत्ते के टुकडो और बोरियो के दम पर कट जाये…वैसे आप बहुत बहुत शानदार लिखा हौ…

  5. क्या शानदार, क्या जानदार लिखाई है.
    पढ़ते-पढ़ते ही ठंड लग आई है.

    और जैसा आपने लिखा:-

    पैसों वालों की तो इस मौसम में बन आई है.
    पर गरीबों के लिए ये मौसम आतताई है.
    अपने पास भी अभी तो ना कम्बल ना रजाई है.
    देखें ये ठंड अपने लिए क्या-क्या सहेज लाई है.

  6. आपने बहुत बढ़िया लिखा है काकेश जी । मेरा भी मन करता है एक बार फिर से ठंड क्या और कैसी होती है जीने को । वाकई ठंड की नौराई लगा दी आपने ।
    घुघूती बासूती

  7. अभी एकमात्र सहारा है.घुटनों को छाती से चिपकाकर बैठने से ठंड को कम करने का प्रयास किया जायेगा. —
    आपने याद दिला दिया पाट्य पुस्तक मानसी का ‘अपना-अपना भाग्य’ पाठ जो भुलाए नही भूलता. इतनी बड़ी दुनिया में इंसान की बेशर्मी को ढकने के लिए प्रकृति ने बर्फ की चादर से मृत बालक को ढक दिया था.

  8. बहुत बढ़िया लिखा है सर…..धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगी है….आने वाले दिनों में आप के लेख ठंड दूर करेंगे, ऐसी आशा है..

  9. आपने बहुत अच्छा लिखा है । बलौग के लिये धन्यवाद ।

    धन्यवाद ।

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