स्त्रियां क्या खुद से सवाल पूछती हैं?

चार जनवरी को शिव कुमार जी की एक पोस्ट आयी थी रीढ़हीन समाज निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलिस डिजर्व करता है जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए रंजना जी ने कहा था.

Ranjana said…

शिव जी,आपकी लेख का अन्तिम पारा पढ़ कर लगा जैसे अपने अन्दर खौल रहे भावों को शब्द मिल गया.एक दम सही लिखा.किसी भी एक को पूरा दोष नही दे सकते.वो लड़कियां जो अधनंगी सी इन स्थानों पर इस तरह जाती हैं ,वो पुरूष वर्ग जो इस तरह के मौकों के तलाश मे तरसती भटकती है ,वो पुलिस जो रीढ़ विहीन और वर्दीधारी डाकू हैं और वो मीडिया जो बिकाऊ ख़बरों के दूकान चलने के सिवाय अपना कोई उत्तरदायित्व नही मानती.ऐसे समाज मी किस से क्या अपेक्षा की जा सकती है.बस रेलवे वाली उस चेतावनी ‘यात्री अपने समान की सुरक्षा स्वयं करें’ की तर्ज पर ”व्यक्ति अपने धर्म,कर्म,जान और माल की सुरक्षा स्वयं करें” धरना को मानते हुए भगवान् का नाम लिए जिए जायें,यही कर सकते हैं.

इस पर घुघुती जी व रचना जी ने आपत्ति की थी.

ghughuti said…

वाह रंजना जी ! मुझे आश्चर्य है कि अब तक आप जैसे सोच वालों ने ऐसे कानून क्यों न बनवा डाले कि अमुक वस्त्र पहनने या न पहनने वाली स्त्रियों लड़कियों का बलात्कार करना मैन्डेटरी है । वैसे शायद आप यह नहीं जानती कि जो वस्त्र हम बड़े गर्व से हमारी संस्कृति का हिस्सा मान पहनते हैं , उसमें जो पेट पीठ दिखता है वह बहुत से समाजों में नग्नता ही माना जाता है । क्यों न हमारे साथ भी वही किया जाए जो इन स्त्रियों के साथ किया गया ?
घुघूती बासूती

अगले दिन रंजना जी ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी दी.जो शायद बहुत लोगों की नजर से नहीं गुजरी. मैने भी इसे आज ही पढ़ा. इसलिये उस टिप्पणी को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

Ranjana said…

क्षमाप्रार्थी हूँ उन समस्त सुधि जानो से जिन्हें भी मेरे वाक्यांश से कष्ट पहुँचा भले प्रतिक्रिया दी हो या न दी हो.मेरा परम कर्तव्य बनता है कि मैं स्पष्टीकरण दूँ.
वर्तमान समय मी अधिकांश खबरी चैनल जिस तरह के और जिस तरह से खबरें परोसते हैं,अक्सर ही हिम्मत नही पड़ती मुख्य समाचार को विस्तार मे देखने की.सो उक्त घटना भी चलते फिरते कानो मे इसी रूप मे आई कि ” ३१ दिसम्बर की रात……….. मनचलों द्वारा सामूहिक छेड़खानी की सनसनी दास्तान……..” इसके आगे न कुछ सुनने जानने की जरुरात समझी न ही इस और कोई उपक्रम किया.प्रतिक्रिया भी किसी घटना या लेख विशेष पर नही किया.नाम से जाहिर है,एक स्त्री हूँ और सचमुच नही मानती कि बलात्कार और दुर्व्यवहार केवल उन्ही स्त्रियों के साथ होता है जो कम वस्त्रों से सुस्सज्जित होने मे विश्वास रखती हैं या इन घटनाओं कि जिम्मेदार स्त्रियाँ होती हैं.यह तो नारी का वह दुर्भाग्य है जो युगों से सीता द्रौपदी से लेकर स्त्री शरीर होने भर से किसी न किसी रूप मे हर स्त्री को ढोनी और भोगनी पड़ती है. किंचित यह पीड़ा,विक्षोभ,असमर्थता ही उस रूप मे फूट पड़ती है जब स्त्री स्वयं को ही कोसने लगती है कि जब तुम्हारे शरीर मे वह बल नही कि अपने बल पर अपनी शील और मर्यादा कि रक्षा करने मे यथेष्ट सक्षम हो सको तो उस पुरूष समाज से क्या अपेक्षा कर सकती हो जो कभी आततायी बनकर तुम्हे अपमानित करता है,कभी दूर खड़ा तमाशबीन बना उसका आनंद लेता है और कभी निर्विकार भाव से यह मानते हुए कि पीड़ित उसका सगा नही और रक्षा करने को उद्धत होना उसका कर्तब्य नही मान लेता है.उनके बारे मे मुझे कुछ नही कहना जो रिश्तेदार होते हुए भी स्वयं को हर प्रकार से मर्यदामुक्त मानता है.इस समाज का ही हिस्सा,उसकी इकाई अपराधी,मूक दर्शक और रक्षक तीनो है.
एक अत्यन्त साधारण साहित्यप्रेमी और पाठक भर हूँ,पर कहना चाहूंगी कि यदि किसी के नाम का परचम ब्लॉग जगत मे ,साहित्य जगत मे या समाज मे रूप ,गुन,धन ,मान,ऐश्वर्यशाली व्यक्ति के रूप मे नही फहरा रहा है तो इसका यह मतलब नही हुआ कि समाज समुदाय मे व्याप्त अव्यवस्था,विसंगति या विभत्सता को देख वह विचलित नही होता होगा,उसका खून नही खौलता होगा.एक साधारण मनुष्य और लंबे अनुभवों को देख भोग चुकी स्त्री हूँ.संवेदनाएं भी रखती हूँ और समझ भी.
भेद तो इश्वर ने संरचना से लेकर सामर्थ्य तक मे कर दिया है.स्त्री को मन धैर्य ममत्व कि असीमित गुणों से सम्रिध्ध कर और पुरुषों को भी अन्य गुणों के साथ शारीरिक बल देकर.मेरे हिसाब से स्त्री इस धरा पर असीमित सामर्थ्य से विभूषित इश्वर कि सर्वश्रेष्ठ रचना है.नादुनियाँ कि समस्त स्त्रियाँ सच्चारित्र होती हैं न सभी पुरूष दुशचरित्र.. पर अन्तर यह है कि कुसंस्कार और अंहकार से ग्रसित पुरूष जब स्त्री को भोग कि वस्तु मान अपमानित करने को उद्धत हो जाता है तो बहुत कम स्त्रियाँ अपने शील और मर्यादा कि रक्षा मे सफल हो पाती हैं.हर व्यक्ति यदि अपनी मर्यादा और कर्तब्य का पालन ही करने लगे तो फ़िर समस्या ही क्या रह जायेगी.पर हम इसकी कामना और प्राथना भर कर सकते हैं.तबतक अपनी रक्षा के लिए यह मानकर चलना पड़ेगा कि सभ्य सुसंस्कृत सक्षम और प्रगतिशील दिखने कि होड़ हम विचार और कर्म क्षेत्र मे आगे बढ़कर तो कर सकती हैं पर जिस किसी भी परिधान और व्यवहार से उनकी पाशविक वृत्ति उभर सकती है,हमे केवल भोग्य रूप मे देखने को उत्सुक हो सकती है ,उस से परहेज करने मे कोई बुराई नही है.
क्या आप नही मानते कि हम मे से ही अधिकांश युवा और आकर्षक दिखने कि होड़ मे फंसी नारी ख़ुद को ” हाट ” और ”सेक्सी” कहलाने मे गर्व का अनुभव करती हैं.आर्थिक स्वतंत्रता,पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्ति से लेकर पुरूष समाज मे व्याप्त मद्यपान,धूम्रपान या इस तरह के बहुत सारे बुराइयों को अपनाना ही पुरुषों कि बराबरी करने का पर्याय मानती हैं.ये स्त्रियाँ समाज और संस्कृति को किस दिशा मे लिए जा रही हैं??किसी भी जाति,धर्म ,देश,भाषा,काल और संस्कृति की अच्छी बातें अपना कर सम्रिध्ध और प्रगतिशील नही रह सकती हम?? .चाहे पृथ्वी हो प्रकृति हो या नारी हो दोहन सदैव से ही स्त्री का होता आया है और होता रहेगा,क्योंकि देने का जो सामर्थ्य इसके पास है उसका दोहन हर कोई करना चाहता है,मौका गंवाना नही चाहता.पर इसी के मध्य पहले स्वयं को समझना,पहचानना और इसी समाज मे सबके बीच रह, अपनी अस्मिता की रक्षा का मार्ग हमे ख़ुद ही निकालना पड़ेगा.व्यक्ति या व्यवस्था को गलियां दे कोस कर जी हल्का किया जा सकता है पर उन सवालों से नही बचा जा सकता जो स्त्रियों को स्वयं से पूछना है.

By काकेश

मैं एक परिन्दा....उड़ना चाहता हूँ....नापना चाहता हूँ आकाश...

49 comments

  1. स्त्रियां कैसे रहें? यह एक अलग विषय है। इसे मुम्बई की छेड़खानी की घटना के साथ जोड़ना उचित नहीं है। क्या एक स्त्री के साथ चाहे वह किसी भी हालत में क्यों न हो उस की इच्छा के विरूद्ध बलात् कोई भी व्यवहार किए जाने को किसी भी प्रकार से उचित ठहराया जा सकता है? वास्तविक बात यह है कि हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज है और संविधान में बराबरी का दर्जा मिलने के बाद भी नारी दोयम नम्बर की नागरिक बनी हुई है। पुरुष इस स्थिति को बनाए रखना चाहते है। क्या यह स्थिति परिवर्तित नहीं होनी चाहिए? जागरूक स्त्रियों को क्या इस के लिए समाज में अभियान नहीं चलाना चाहिए?
    उक्त प्रश्नों का जवाब महिलाएं दें, तो अधिक उचित होगा। हालां कि मेरा मानना है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना महिलाएं बराबरी का यह दर्जा प्राप्त नहीं कर सकतीं। बहुसंख्यक महिलाएं जब तक इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेतीं। समाज में इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती रहेंगी।

  2. काकेशजी आप जिसका जिक्र कर रहे हैं उस कांड और उसके बाद की प्रतिक्रियायों को भी पढा.
    हमारे मित्र सुल्तान अहमद की पंक्तियाँ है
    हमारी सीता का हरण होगा तब लड़ेंगे हम,
    जटायू इस बात पर आँसू बहा रहा है.
    सहादत हसन मंटो की कहानी भी पढी जिसमें एक मित्र सीढियां उतरती एक शादीशुदा लड़की के साथ आम प्रचलित हरकत करता हैं पीछे से आ रहे उसके मित्र को देख कर लड़की रोती चिल्लाती गालियाँ देती है.तसल्ली देने वाला मित्र उसके गालों के पहले आँसू पोछता है फिर कंधे से लगा तस्ल्ली देता है लड़की मुस्करा उठती है.
    तस्लीमा नसरीन बताती हैं एक टेलर की दुकान पर लड़की टेलर को जोरदार थप्पड़ लगा अपने कपड़े वापिस ले चली जाती है.
    अब अपनी बात
    लड़कियां महिलायें प्राया पुरुष टेलर पर ही कपड़े सिलवाना पसंद करती है, उनकी कुशलता को तर्जीह देती हैं क्यों नही अपनी स्त्री बिरादरी से कपड़े सिला उन्हें रोजी रोटी का मौका प्रदान कर पुरुषों का बहिष्कार करती. फिर वही आलाप होगा सब पुरुष ऐसे नहीं होते पर जो होते हैं उनसे कुछ तो बचाव हो.
    रही बात स्त्री के सामर्थ्य की तो वो पुरुषों से ज्यादा बहादुर,बुद्धिशाली,निर्णायक क्षमता रखती हैं.
    ये बात अपने अनुभव से कर रहा हूँ.एक मोटर सायकिल रेली में 80 90 की स्पीड पर हम लोग जा रहे थे तो एक लडका गुस्से के साथ रोने लगा की स्पीड घीमे करूं तो दूसरी तरफ यामा बाइक पर मेरे पीछे आ रही लडकी मात दे गयी उसके पीछे वाली हाथ हिला कर मझे लज्जित कर रही थी.
    हद तो तब हो गयी जब मैं एक स्टेन्ड पर चाय पीते हुए लडकों को समझा रहा था कि तुम गाड़ी चलाते हुए इन लड़कियों से मोबाइल पर बात मत करों ये मरवायेंगी तुम्हें उन्हे कुछ नही होगा.
    और तभी रेली में मुझसे तेज बाइक चलाने वाली लडकी ने पास से एक फूल तोड़कर मुझे दे दिया.
    मैंने पूछा मतलब उसने कहा इस फूल का नाम और मेरा नाम एक ही है आप को याद रहना चाहिए.
    मैं समझ गया वो मुझसे कह रही थी तुम हमें समझते क्या हो.मैं लज्जित तो था पर उन तमाम लड़कियों की बहादुरी पर गर्व भी कर रहा था.बरोडा सूरत हाइवे पर बाइक और एक्टिवा पर जब वे कट मारती हुई आगे निकलती तब लड़के शिकायत करते सर ये लड़कियां हमारे आगे से कट मारती एक्सीडेन्ट करवायेंगी.मैं कहता जो डर गया समझो मर गया.

    कला संगीत नृत्य शिक्षा की प्रतियोगिताओं में जब उनका एकछत्र राज देखता हूँ तब मीठी जलन के साथ मज़ा आजाता है.
    बीकानेर के अखिल भारतीय केम्प में कश्मीर और राजस्थान की एन.सी.सी.छात्राओं ने गीत नृत्य की प्रतियोगताओं में लड़कों को ऐसा पछाड़ा कि एक साहब कहने लगे भदौरिया साहब लड़कियों की सिद्धियों मे जो रफ्तार है उसे देख कर कहा जा सकता है कि अब वे दिन दूर नहीं जब वे पुरुषों से कहेंगी घर में बैठ के वर्तन मांजो खाना बनाओ,कपडे धोओ बच्चे खिलाओ तुम से कुछ नहीं होगा.अब जो करना है हम करेंगी.आमीन

    एक पहलू दूसरा भी है जिसका रंजनाजी जिक्र कर रही हैं उससे मुझे भी काफी कुढन होती है

    अभी राजस्थान एक केम्प में जाने से पहले एक पोस्ट में लिख गया था.सर्विस बुक से छेड छाड़ और हम पर होते बलात्कार.उसमें लिखा था
    ईश्वर ने हमारे साथ बड़ा अन्याय किया उसने हमें सुन्दर स्त्री नही बनाया.अगर हमे सुन्दर स्त्री बनाया होता तो हमारे सी.आर .नही.बिगड़ते.चार साल से बिना किसी सूचना के इंक्रीमेन्टस नहीं रुकते.हम अपने कॉलेज में आफिस आवर में अपने पिंसीपल के साथ ही सो जाते.उनके पास बैठकर अपने ऊपर खूब हाथ फिरवाते.इससे हरामी बुढ्ढों को मानसिक स्वास्थय ठीक रहता है.एक कॉलेज की अध्यापिका ने टसुये ढरकाते हुए इस लेख की शिकायत हमारी धर्म पत्नी से कर दी. मैं बीकानेर केम्प में गया हुआ था.धर्मपत्नीजी ने मोबाइल चिल्लाते हुए कहा क्या आग लगाके गये हो.सीधे रहना ही नहीं आता. कॉलेज की अध्यापिकायें तुम्हारे खिलाफ नारी सेल में जायेंगी मैने कहा तुम उन्हें हाईकोर्ट भेजो और साथ में तुम भी जाओ वे कह रहीँ थी क्या सारी स्त्रियां उच्च स्थानो पर इसी तरह पहुँचती हैं जैसा तुम लिखते हो मैंने तुम्हार सब पढ़ लिया है.
    खूब मोबाइल पर झगड़ा हुआ हमारा पासबर्ड मांगकर उस लेख को हमारे सुपुत्र से डिलीट करवा दिया गया. जाओ अब क्या करोगे.
    पर वो लेख मेरी फाइल में सेव है.जब चाहूँ तब प्रकाशित करूँ पर उससे घर की शांति भंग होने का खतरा है.कॉलेज में उस लेख की कई प्रतियों की ज़ेरोक्ष प्रतियां घूमने लगी कई ने चुपके से बधाइयाँ भी दीं.किसी ने हम से पूछने की जुर्रत नहीं की क्योंकि वे जानते है अभी मात्र लेख है ज्यादा छेड़ा तो सचित्र वर्णन होगा.सो काकेशजी ग़म बहुत सारे है पिछले 10 दिनों से गुजरात हाईकोर्ट में पीटीशन तैयार करवानें में लगा हुआ था चार साल से रुके इंक्रीमेन्ट रुकने का मामला है सी.आर.में 98 में लिखा गया था स्वभाव अच्छा नहीं हैं तुरंत गुस्सा करते है.
    स्वभाव अभी भी कहां अच्छा है पूरे 17 साल के शैक्षिक केरियर में कहीं मेमो तक नहीं मिला .
    फिर सी.आर.कैसे खराब हो सकते हैं.अब इसपर जंग होगी और हमारा ट्रांसफर अहमदाबाद से दूर दराज के गाँव में फिर हम नेट पर नहीं लिख पायेगें जो लोग हम से दुखी हैं अभी से जश्न मनाये.

  3. “क्या आप नही मानते कि हम मे से ही अधिकांश युवा और आकर्षक दिखने कि होड़ मे फंसी नारी ख़ुद को ” हाट ” और ”सेक्सी” कहलाने मे गर्व का अनुभव करती हैं।आर्थिक स्वतंत्रता,पारिवारिक उत्तरदायित्व से मुक्ति से लेकर पुरूष समाज मे व्याप्त मद्यपान,धूम्रपान या इस तरह के बहुत सारे बुराइयों को अपनाना ही पुरुषों कि बराबरी करने का पर्याय मानती हैं.ये स्त्रियाँ समाज और संस्कृति को किस दिशा मे लिए जा रही हैं??”

    रंजना शायद उसी धारा को मानती है जहाँ सारे मोरल नारी के लिये हैं । जब रेप और मोलेस्टेशन होता है तो कोई जरुरी नहीं है कि महिला ” हाट ” और ”सेक्सी” हो । अगर आप कि यादाश्त सही हो तो अरुणा Shanbaug को याद करे जिसका बलात्कार १९७३ मे हुआ था । उस समय ना तो आप के हिसाब से वो महिला ” हाट ” और ”सेक्सी” थी ऑउर ना उस समय पुरुषो कि बराबरी हो रही थी । आप को ना याद आया हो तो ये लिंक देखे http://www.tribuneindia.com/2002/20020531/nation.htm#8

    आप का ब्लोग लिंक नहीं खुलता है , आप के नाम पर क्लिक्क करो तो प्रोफाइल नहीं दिखता है तो आप अपने अस्तित्व को बचा कर लिखना चाहती है और यही नारी की सबसे बढ़ी कमजोरी हैं की वह दबी ढकी रहना चाहती है , पर मेरा आप के इस निर्णय से कोई विरोध नहीं है क्योंकी ये आप कि जिन्दगी है , उसी प्रकार आप जब दूसरी नारी के रहन सहन पर कमेन्ट करे तो ध्यान रखे समाज के पतन के लिये नारी के कपडे नहीं जिमेदार है ।
    नारी की मानसिकता जिमेदार है । हेर गलत चीज़ को स्वीकार करना नारी कि आदत होगई है और पुरुषो से पाना उसकी नियती ।
    हमर ब्लोगेर समाज मै भी अगर नारी को पुरूस्कार दिया गया है तो इस लिये क्योंकी वह नारी है और उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिये । http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2008/01/blog-post_12.html अगर हम equality का दावा करते है तो हमे किसी भी चीज़ को केवल इसलिये नहीं स्वीकार करना चाहेयाए क्योंकी वह हमे हमारे नारी होने कि वज़ह से मील रही है । मै इसे मानसिक परतंत्रता समझती हूँ
    आर्थिक स्वंत्रता से कोई फायदा नहीं है अगर आप मानसिक रूप से परतंत्र हैं ।
    हर माँ को अपने पुत्र को वही समझाना होगा जो वह अपनी पुत्री को समझाती है ताकि समाज मे बराबरी रहें ।
    बुरी हमारी सोच मे है कि हम रेप और मोलेस्टेशन मे भी ये देखते है कि नारी के कपडे कैसे थे !!!!!!!!!!!
    माफ़ करे रंजना मे आप कि राय से बिल्कुल इतेफाक नहीं रखती और मै नारी के प्रती कही भी गलत लिखा देखती ह तो विरोध करती हूँ ताकि आगे आने वाली नारियों को उतनी लड़ाईया ना लड़नी पड़े ।

  4. देखिये, रंजना जी की पहली टिप्पणी की एक लाइन के आधार पर उन्हें ग़लत ठहराया जाना ठीक नहीं है. इसी पोस्ट पर बालकिशन की टिपण्णी है जिसमें उन्होंने लिखा है;

    घुघुती जी और सागर भाई,

    मेरा विचार है कि रंजना जी के कमेंट को सामान्य तौर पर लेना चाहिए. एक सामान्य सोच है कि ऐसी घटनाओं के लिए बहुत सारे लोगों को जिम्मेदार मान लिया जाता है. उनका कमेंट शायद इसी बात को दर्शाता है. आख़िर हमें ये मानकर चलना चाहिए कि जो कुछ भी लिखा जाता है या बोला जाता है वह हमेशा सही हो, ये ज़रूरी नहीं है. आख़िर, हमसब साधारण इंसान हैं, हम कभी भी एक समाजशास्त्री की जगह नहीं ले सकते.

    @रचना जी,

    मैंने ऊपर जो भी लिखा कि जो कुछ लिखा जाय या फिर बोला जाय, वह हमेशा सही हो, आपके कमेंट में झलकता है. आपने बड़ी आसानी से लिख दिया कि रंजना का अपना कोई अस्तित्व नहीं है. क्या ब्लॉग और प्रोफाईल रहने से ही किसी का अस्तित्व होता है?

    रंजना जी को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ. मेरी दीदी हैं. रचना जी के प्रति मेरे मन में बहुत इज्जत है लेकिन बाल किशन की तरह मैं भी उनकी इस बात से मैं इत्तेफाक नहीं रखता कि ‘अस्तित्व’ के लिए ब्लॉगर होना या फिर ब्लॉग लिखना जरूरी है. हो सकता है कि कोई केवल ब्लॉग पढता हो, और लिखता न हो. रंजना दीदी को अपनी पहचान छिपाने की कोई जरूरत नहीं है.

    हम हमेशा शिकायत करते हैं कि हाल के वर्षों में महिलाओं के साथ हिंसा बढ़ गई है. हमारा नैतिक पतन तेजी के साथ हुआ है. लेकिन क्या पहले के समय की तुलना आज के समय से करना ठीक रहेगा? पहले महिलाएं क्या पुरुषों के साथ उतने समय तक ही रहती थीं, जितना आज? इस बात को कहकर मैं किसी अपराध को सही नहीं ठहरा रहा. मेरा कहना केवल इतना है कि अपराध रोकने के लिए बनाए गए कानूनों का इस्तेमाल जब तक सही ढंग से नहीं होगा, अपराध होते रहेंगे. आख़िर मनुष्य का चरित्र मूलतः ऐसा है, जैसा दिनकर जी ने लिखा है;

    अपहरण, शोषण, वही कुत्सित वही अभियान
    खोजना चढ़ दूसरों के भष्म पर उत्थान
    शील से सुलझा न सकना, आपसी व्यवहार
    दौड़ना रह-रह उठा उन्माद की तलवार
    द्रोह से अब भी वही अनुराग
    प्राण में अब भी वही फुंकार भरता नाग.

    मनुष्य के अन्दर ऐसा कुछ भी नहीं रहता, जो उसे ग़लत काम करने से रोके. उसे ग़लत काम करने से रोकता है किसी का भय, इस काम के लिए मिलने वाली सजा. लेकिन अगर भय न हो, तो फिर ऐसा होता रहेगा.

  5. agar aap kisii blog per kament daete hae aur apni shkshiyat nahin batate to mera manana he kii aap blogger nahin hae aur agar aap blogger nahin to blog per aap kaa koi astitav hee nahin hae
    ranjana kaa astitav aur blogger ranjana kaa astitav do alag alag cheezae hae mae ranjana ko nahin jaantee per blogger ranjana agar kahin kament daetee hae toh mae usae jaantee hun aur usko jyaada jaane kae liyae uska link click kartee hun to wahaan koi pataa nahin chalta .
    mear irada ranjana kii shaksiyat per ungli udaane ka nahin hae per blogger ranjana agar kament kare to parde mae naa rahe , baahar aayae aur likhae mae sirf itan kehan chaahetee hun
    unkae personl vaktitav ko mae jaantee hee nahin toh usper tikaa tipaani naa samjeeyae

  6. “ब्लॉगिंग की दुनिया को जहाँ तक हमने समझा है उसमे न तो कोई स्त्री है न पुरुष हर कोई सिर्फ एक ब्लॉगर होता है।जहाँ उसकी पहचान उसके ब्लॉग से होती है।”
    i have picked these lines from mamtas latest post http://mamtatv.blogspot.com/2008/01/blog-post_11.html
    here also pehchaan yaa astitav blogger ka uska blog hee hota hae

  7. मेरी माँ बहन बेटी सभी स्त्रियाँ है लेकिन मैं जब बेटी का रिश्ता करने जाऊगा तो बेटी चाहती है लडका कम से कम 4 इंच लम्बा हो तथा उससे ज्यदा कमाता हो। क्यो बराबारी चाहती है ये समाज वादी औरतें ? सामाज में सभी को बराबरी नहीं वरन सम्मान मिलना जरूरी है बराबरी की मागॅ इस भेद को केवल अधिक बडा कर रही है। इन बैवकुफ समाज वादी औरतो को भी नहीं पता ये समाज का कितना अहित कर रही है।

    एक औरत अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर पुरूष से ज्यदा माल बेचती है तब उसे याद नही आती बराबरी

    कई बस में सफर कर रहे हो या ट्रैन के टिकट की लाईन हो क्यों इन्हें बराबर नही रखा जाता वास्तव में प्रकृति ने हम सभी को अलग अलग रोल दिये हैं और हमें ये करने होंगे। क्यों बराबर धरती नहीं है कही पहाड तो कही तलाब, क्यों बराबर ऋतु नही हैं। आखिर पुरूष तो बराबरी कर 9 मास तक बच्चे को पेट में नहीं रख सकता।

    अगर स्त्रियाँ सम्मान चाहती है तो मेरी राय में रात को 2 बजे शराब पीकर समुद्र पर धुमना सम्मान नहीं दिला सकता इस दौड में कई आज कल धुम्रपान मदिरा पान कर रही है कल क्या वो बराबर होकर पुरूष की तरह बलात्कार करना पसंद करेंगी

  8. Bahin ji,chodiye bhi.kyo nahak khoon khoula rahi hain apna.Aaapka blog maine dekha .bada achcha kaam kar rahi hain.Lagi rahen.Khoob naam kamayen,nari jaati ka naam roushan karen.Hamara kaam to aap jaisi sudhi jano ka blog padhkar hi chal jata hai.Mua itna kuch hai padhne ko pustakon se lekar blog tak ki blog banane ki fursat hi nahi milti.Apne blog se fursat mile to tanik achchi cheeje padhiye.Bahut sare logon ne badi achchi achchi baten likh chodi hain.Duniyan me achcha bhi itna kuch dekhne sun ne sochne ko hai ki hame to usi se fursat nahi milti.Lagta hai jab chhantaak bhar ke is dimaag ka prayog agar bura dekhne me gujar denge to usi ko dekhte hue kab taany taany fiss ho jayen aur upar jakar us se kahen,ki prabhu thodi si jindagi aur de do aapne jo itna sundar itna achcha itna kuch banaya use dekh nahi paayi,to prabhu ji to ekdam se jutiya denge.Aap sukhi hongi to mujhe achcha lagega.Isliye nek salah maniye.Bahan ghughuti se bhi kahiye ki thodi der ke liye focus burai par se hatakar achchai ki taraf karen aur dekhen,sachmuch striyon ki sthiti badi behtar hui hai.

    (देवनागरी में :काकेश)बहिन जी,छोड़िए भी.क्यो नाहक खून खौला रही हैं अपना.आपका ब्लॉग मैने देखा .बड़ा अच्छा काम कर रही है.लगी रहें.खूब नाम कमाएँ,नारी जाति का नाम रोशन करें हमारा काम तो आप जैसी सुधि जनों का ब्लॉग पढ़कर ही चल जाता है.मुआ इतना कुछ है पढ़ने को पुस्तकों से लेकर ब्लॉग तक की ब्लॉग बनाने की फुर्सत ही नही मिलती.अपने ब्लॉग से फुर्सत मिले तो तनिक अच्छी चीज़े पढ़िये.बहुत सारे लोगों ने बड़ी अच्छी अच्छी बातें लिख छोड़ी हैं.दुनिया में अच्छा भी इतना कुछ देखने ,सुनने ,सोचने को है की हमें तो उसी से फुर्सत नही मिलती. लगता है जब छटांक भर के इस दिमाग़ का प्रयोग अगर बुरा देखने मे गुजार देंगे तो उसी को देखते हुए कब टांय टांय फिस्स हो जाएँ और उपर जाकर उस से कहें,की प्रभु थोड़ी सी जिंदगी और दे दो आपने जो इतना सुंदर इतना अच्छा इतना कुछ बनाया उसे देख नही पाई,तो प्रभु जी तो एकदम से जूतिया देंगे.आप सुखी होंगी तो मुझे अच्छा लगेगा.इसलिये नेक सलाह मनिये.बहन घुघुति से भी कहिए की थोड़ी देर के लिए फोकस बुराई पर से हटाकर अच्छाई की तरफ करें और देखें,सचमुच स्त्रियों की स्थिति बड़ी बेहतर हुई है.

  9. logon ne kafi lambi chaudi baten ki.
    Kewal ek hi bat kahoonga, chahe purush ho ya mahila, ya koi aur.
    Yadi vo desh ke kanoon ka palan karta hai to chahe vo jaise rahe use swatantrata honi chahiye, aur jo kanoon tode use saja milni chahiye. New year par kisne kanoon toda sab jante hain,
    Jo log mahilan ke kapdon ko doshi mante hain, yadi unka tark agey bhadayen to dekho kya hoga. Yadi kisi ki car chori ho gayi to kahenge ki ap itni achhi car kyon rakhte hain jo chori ho jaye.
    Yadi sita ka apahran ravan ne aaj ke yug mein kiya hota to kehte ki aapne itni sundar patni kyo rakhi ki uska apharan ho jaye. Kisi ke ghar chori ho to kya aap kahenge kre are bhaiitna kyon kamate ho jo chori ho. Kehne ka matlab Kapdon vala tark ekdam bakwaas hai.
    yadi desh vakai mein swatantra hai to desh mein desh ka vidhan chalna chahiye na ki koi naitikta a lecture.

  10. मे आदम भाई की सब बातॊ से सहमत हु,उन्होने सो बातो की एक बात कह दी,बाकी जो स्त्रि , मां, बहिन,बेटी ओर बीबी बन कर रहती हे हमेशा इज्जत पाती हे मान समान पाती हे, जो बराबरी चाहती हे,उसे शायद बराबरी मिलती हे या नही यह तो बोही जाने,लेकिन बो मान समान जो एक परिवार की स्त्रि को मिलाना चाहिये,बो प्यार जो एक बहिन ,बेटी ओर बीबी को मिलना चहिये,उस से हमेश वचिंत रहती हे, मे किसी से बह्स नही चहाता, ना ही किसी का दिल दुखाना चाहता हु

  11. test on January 15th, 2008 at 7:49 pm आपसे सहमत हूँ । अपनी बात को इतने सुलझे ढंग से रखने के लिए धन्यवाद । रंजना जी ने चलते फिरते खबर सुनी और पीढ़ियों से चलते आ रहे चलन के अनुसार पीड़ित स्त्रियों को अधनंगी होने की उपाधि दे दी । मैं केवल यही प्रार्थना कर सकती हूँ कि ऐसी मानसिकता वालों के घर में कभी कोई पुत्री ना जन्मे । कुछ और लेखकों ने ऐसी बातें कह दीं हैं जो सदा से स्त्रियों का मुँह बंद करने को कही जाती हैं । जिन्हें ना ही दोहराया जाए तो अच्छा है ।
    दिनेश राय जी की राय से भी सहमत हूँ व उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद ।
    शिवकुमार जी से पूछना चाहूँगी कि क्या इतनी भद्दी टिप्पणी जिसमें एक नारी को अधनंगा कहकर उसके साथ हुए दुर्व्यवहार को लगभग सही ठहराया जाना वे सामन्य रूप से ले सकते हैं, कमसे कम मैं नहीं ।
    आदम जी के अपने विचार हैं , उन पर कुछ ना ही कहा जाए तो बेहतर है ।
    रंजना सिंह जी की राय पर ध्यान दूँगी । कल से नाली की बास पर ध्यान न देकर प्लास्टिक के बिकते फूलों में सुगंध ढूँढूगी ।
    राज भाटिया जी , ठीक है । आपके हिसाब से बराबरी चाहने वाली स्त्री को मान सम्मान नहीं मिल पाता । मान पाने के लिए उसका माँ, बहन, बेटी, पत्नी बनना आवश्यक है । शायद आपकी नजर में कलाम जी व अटल जी भी आदर के हकदार नहीं होंगे या मैं फिर अपनी उस पुरानी बराबरी की बीमारी की शिकार हो गयी हूँ ?
    मेरे विचार में हमारे संविधान में कुछ गड़बड़ियाँ रह गई हैं जिन्हें बदलकर सबको बराबर के अधिकार वाली बात को निकाल देना चाहिये ।
    आज समझ आया क्यों तुलसीदास जी ने ढोर गंवार शूद्र और नारी वाली बात कही थी । और यह भी समझ आया कि हमारे दलित बन्धुओं की पहले तो धुनाई, अनादर या कुछ ऐसा करके जब उन्हें क्या करना चाहिये, क्यों करना चाहिये का ग्यान दिया जाता होगा तो कैसा महसूस होता होगा । क्योंकि ठीक यही ग्यान हमें भी दिया जा रहा है ।
    मुझे आशा है कि संसार के सभी दबाए हुए प्राणी ,चाहे वे स्त्रियाँ हों, दलित हों, गंवार हों एक दूसरे का दुख समझ सहायता के लिए आगे आएँगे ।
    क्या यह उस भेड़िये और मैमने की कहानी सा नहीं है, जिसमें वह मैमने के पानी जूठा करने के लिए सजा में उसे खाना चाहता है ? जब वह कहता है उसने तो अभी पानी पिया ही नहीं तो भेड़िया कहता है कि तुम्हारे पिता ने जूठा किया था। तुम्हारा बलात्कार, पिटाई, बैइज्जती इस या उस कारण से हो रही है ।
    भाई भेड़िये हो तो यूँ ही खा जाओ, कमसे कम शिकार का दोष तो ना बताओ । वह तो घाव में नमक छिड़कने सा है ।
    एक और बात, अब यह भी समझ आया कि यह बलात्कार सी वारदात सामूहिक क्यों थी व क्यों इतने लोगों के बीच वे स्त्रियाँ चीरहरण का शिकार हो रही थीं । जब हमारे पढ़े लिखे लोग ऐसे विचार रखें तो और क्या अपेक्षा की जा सकती है ।
    कल तक आश्चर्य था आज नहीं है ।
    घुघूती बासूती
    पुनश्च ….अन्त में एक और बात ! बहुत साल पहले यूरोप की एक अदालत में एक स्त्री का एक पुरुष पर बलात्कार पर लगाया हुआ आरोप न्यायाधीष ने यह कहकर खारिज कर दिया था कि जीन्स पहनी हुई स्त्री से बलात्कार हो ही नहीं सकता । क्योंकि बलात्कारी के लिए उन्हें निकालना असम्भव है ।
    आज उन्हीं जीन्स के कारण ये स्त्रियाँ अधनंगी कहला रही हैं । माफ करना ,वैसे उनसे कम लम्बाई की जीन्स यह अभियोग लगाने वाली की घर की सदस्या ने पहनी थी ।
    रंजना जी, आप मेरी मित्र हैं । आपसे मेरी और कोई शिकायत नहीं है, केवल इतनी अपेक्षा करती हूँ कि जिसपर अन्याय हो रहा हो उसपर अन्याय करने को उकसाने का आरोप ना लगाएँ ।
    घुघूती बासूती

  12. घुघूती बासूती जी बराबरी किस से कर रही हे, पुरषॊ से, जो एक बाप हे, भाई हे,पति हे,बेटा हे, हा अगर इन से बराबरी चाहती हे तो मुझे हसी आती हे यह सब तो बिन मागे ही उस बराबरी से ज्यादा इज्जत मान तुम्हे दे रहे हे,फ़िर बात आती हे रनंजना जी की उन्होने कुछ गलत नही कहा,हम हमेशा आपना हक मगाते हे,जो हमारा जन्म सिद आधिकार हे लेकिन हमारी स्व्तन्त्र्ता बहा खातम होती हे जहा दुसरे को उस से नुक्सान पहुचे,हमे अपनी पसन्द के कपडे पहनाने की आजादी हे लेकिन जिस समाज मे हम रहते हे उस समाज के साथ भी हमे तालमेल बिठाना पड्ता हे,अगर अधनगे शरीर को अधनगां नही कहे गे तो ओर कया कहेगे,अगर कसाई मास काट कर खुले मे रखे गा तो चील कोवे, ओर कुते तो झपट मारे गे ही,अब कसाई की गलती हे या फ़िर उन जनवारो की ???
    कुछ गलत बोलगया तो माफ़ी चाहुगा

  13. राज भाटिया जी, बहुत सुन्दर लिखा है । हम तो खुला या ढका पर कटा माँस हैं , चील कौवे तो सबको पता है कौन हैं, वे हमारे ही जन्मे हुए हैं, जो अब हमारा ही माँस अलमारी में ताले बन्द ना हो तो चबा जाएँगे । अब यह भी बता दीजिये कि यह कसाई कौन है ? कहीं यह उन स्त्रियों का पालक, पिता, पति, भाई, पुत्र तो नहीं ?
    घुघूती बासूती

  14. @raj bhatia
    khaas aap ke liyae

    हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

    क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
    कि नारी को हथियार बना कर
    अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
    क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
    कि नारी शरीर कि
    संरचना को बखाने बिना
    साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
    तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
    वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
    तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
    बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
    वह फैशन वीक मे काम करे
    तो नंगी नाच रही है
    तुम्हारी तारीफ हो तो
    तुम तारीफ के काबिल हो
    उसकी तारीफ हो तो
    वह “औरत” की तारीफ है
    तुम करो तो बलात्कार भी “काम” है
    वह वेश्या बने तो बदनाम है

    हे नर
    क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

  15. arey bahayi baraabri ki baat jaaney do, ye apna apna drishtikod hai .bhagvaan har ek ko aisa dil nahi bakshta ..aisa karo ki sirf SUMMAN karlo strii jaati kaa…..insaan hai vo bhi insaaniyat ki nazar se dekhna seekh jao bas…

  16. पता नहीं राज भाटिया अपने घर मे फरक कैसे कर पाते होगे , अपनी माँ , बहिन , पत्नी और बेटी मे सब माँस ही तो है । जब चाहो जहाँ मुहं मार लो । क्या फरक पड़ता है
    maeriawaaj.blogspot.com

  17. वाह बहनजी,यह अच्छी रही.मित्र भी कह दिया और लगे हाथों पुत्रीहीन होने का आशीर्वाद भी दे दिया.बस कुशलता यह रही की थोडी देर से दिया नही तो क्या पता आपका आशीर्वाद काम कर जाता तो इतनी प्यारी बेटी की माँ होने के गौरव से वंचित रह जाना पड़ता.अपनी पर्सनल आईडी दीजियेगा उसमे अपनी बेटी की तस्वीर भेज दूंगी.हो सकता है जितनी प्रसन्नता गौरवान्वित उसकी माँ होने मे मुझे होता है,मित्र होने के नाते मेरी खुशी से आपको भी हो.
    सोचा था छोड़ो फालतू के झमेले को,खत्म करो.क्यों नाहक समय और सामर्थ्य बरबाद किया जाए.पर मर्म पर चोट लग जाए थोडी सी आह निकले बिना नही रहा जाता.
    जानती हैं बहन,दुनिया मे हर व्यक्ति जो कुछ देखता,सोचता और करता है,सामने पड़ी परिस्थितियों के आधार पर वह जितना निर्भर होता है,उस से बहुत अधिक अपने संस्कारों पर निर्भर करता है.अब देखिये न,कोई एक घटना यदि १०० लोगों के बीच घटती है तो उसपर १०० वों की प्रतिक्रिया एक सी नही होती.भले घटना एक हो,पर उसे व्यक्ति percieve अपनी अपनी तरह से करता है जो पूर्णतः उसके अपने संस्कार विचार पर आधारित होते हैं.
    चलिए थोडी बात बराबरी की कर ली जाए.
    बड़ी बेसिक बात है कि बराबरी या तुलना सम वस्तुओं के बीच होती है.एक आम और एक हाथी मे कौन बड़ा,सही और ठीक है और दोनों के रंग रूप कर्तब्य,गुन दोष की तुलना मे समय गंवाना कितना उचित है. ?अरे भाई,हाथी हाथी है ,आम आम है.दोनों अपनी अपनी जगह.यदि तुलना करने का ही मन हो तो ऐसे कीजिये.
    स्त्री—१).सर्वोत्तम,२).बहुत अच्छी,३).अच्छी ४).ठीक ठाक,५).बुरी,६) बहुत बुरी.
    इसी तरह से पुरुषों का भी वर्गीकरण कीजिये.स्त्री पुरूष ही क्यों किसी भी प्रजाति,वस्तु या किसी भी चीज का कीजिये तो निर्णय करने मे बड़ी सुविधा होगी.और आप देखियेगा प्रजाति विशेष के समस्त जनसंख्या को इकठ्ठा कर गुन दोषों,कर्म,आचरण के आधार पर सारे खानों मे संख्यां डालने लगेंगी तो कोई खाना खाली नही जाएगा.
    अपने नारी समाज मे आज बड़ी भ्रामक सी स्थिति है.उन्हें नही पता कि उनका अस्तित्व,सामर्थ्य,कर्तब्य क्या है और वे क्या चाहती हैं.और यही भ्रम समाज को अव्यवस्थित करती है.मेरा व्यक्तिगत मानना है कि चूँकि ईश्वर ने स्त्री को श्रृजन करने की वह क्षमता दी है जो केवल एक हाड मांस का पुतला ही नही एक पूरा व्यक्तित्व सृजित कर सकती है जो अंततः समाज का ही हिस्सा होता है.इसलिए स्त्री का कर्तब्य पुरूष से ज्यादा बड़ा है और उसकी समाज के प्रति जवाबदेही भी ज्यादा बनती है.इसलिए मेरी स्त्री जाति से अपेक्षाएं भी अधिक हैं.
    आपने सही कहा कि जिस ख़बर पर इतनी बहस चल रही है,उस ख़बर विशेष को मैंने घम्भीरता से नही देखा.इसलिए कि उसी ३१ जनवरी के रात की एक दूसरी घटना से (जहाँ कि ईश्वर की कृपा से कोई दुर्घटना नही घटी )मैं बड़ी आहत थी.चलिए आपको भी सुनाती हूँ.
    बच्चों ने बड़ी जिद की की ३१ दिसम्बर की रात की कूद मे हम भी शामिल होंगे.एक तो ३ डिग्री तापमान,उसपर से वह कनफोदू संगीत और बड़े बड़े नामी गिरामी क्लबों का जो माहौल होता है,बड़ी अशांति होती है.सो बच्चों को मनाने की कोशिश की पर उनकी ललक के आगे मजबूर हो चली गई.बहनजी,आपने भी वो माहौल जरूर देखी होगी.३० बाई ३० के डांसिंग फ्लोर पर करीब ३०० लोग चढ़े कूद रहे थे उस कन्फोदू संगीत पर. संगीत पर कूद रहे थे या एक दूसरे के शरीर पर अन्तर करना कठिन था.हमारी ही बरादरी की बहन बेटियाँ और कुछ माओं ने भी सारे शरीर पर बित्ते भर नीचे और उस से भी छोटी तंग वस्त्रों को ऊपर इस तरह धारण कर रखा था कि समझ मे नही आया कि उनके ये वस्त्र मौसम के अनुकूल थे या उन्हें धारण करने का उद्देश्य क्या था.और तिसपर सोने पर सुहागा यह कि जितना सुरा पान कर सकती थीं ,कर रखा था.जिस तरह से भीड़ मे घुसीं कूद फांद मचाये हुए थीं, मेरा सिर शर्म से झुक गया बहन जी.उतनी ही शर्म आई जितनी बंगाल मे रैली मे जब एक आदिवासी लड़की को लोगों ने मिल शर्मशार किया था.आगे और क्या कहूँ. जीवन मे आज तक जितना देखा है, यदि अच्छी स्त्रियों से परिचय करना हो तो आइएगा ले चलूंगी,मिलवाने और यदि पथ्भारष्ट स्त्रियाँ न देखीं हो आज तक, तो मुझसे कहियेगा,ऐसी ऐसी स्त्रियाँ हैं कि उनके लक्षण देख अपने को स्त्री कहने कि हिम्मत नही पड़ेगी.
    क्या ऐसा हो सकता है बहनजी,कि एक ऐसा समाज बनाया जाए जहाँ सिर्फ़ स्त्रियाँ रहें और पुरुषों को किसी दूसरे ग्रह पर भेज दिया जाए.यदि आपको लगता है होना चाहिए.तो बताइयेगा,कोशिश तो किया ही जा सकता है इस ओर उपक्रम करने का भी.लेकिन एक रिस्क है.यदि ऐसा किया गया तो भूले भटके यदि कोई एक पुरूष धरती पर आ गया तो सोच लीजिये उसकी स्थिति शायद उस से भी बुरी होगी जो यदि शाहरुख़ खान,माइकल जैकसन या इसी तरह का कोई व्यक्ति बिना सुरक्षा कर्मियों के लड़कियों के झुंड के बीच आ गिरता है.उसका कैसा बलात्कार हो सकता है इसकी परिकल्पना कर के तो देखिये.
    बहन जी,प्रकृति से लेकर मनुष्य के किसी भी प्रजाति का कोई भी इकाई जब अपनी मर्यादा का उलंघन करता है तो विभत्सता पैदा करता ही है.पर इसके लिए यह नही कह सकते कि अमुक पुरा समाज ही अमर्यादित है.
    सबसे पहली आवश्यकता तो मनुष्य बनने की है,फ़िर स्त्री या पुरूष और फ़िर देखिये सारा तथ्य सत्य स्पष्ट दिखने लगेगा.दुर्घटना को दुर्घटना कि तरह देखिये,जो कहीं भी ,किसी परिस्थिति मे किसी के भी साथ घाट सकता hai.

  18. कुछ लोगो को प्रलाप की आदत होती है जो बार बार अपनी बात को घुमा घुमा कर कहते है , रंजना भी उसी परिपाटी कि है । जब ३१ तारीख को इतनी रात को वह घूम रही थी । कुछ तो जरुर हुया होगा , अब आप अपनी बहिन से नहीं कहेगी तो अपने मन की बात किस से कहे गी । सब औरते नंगी थी , आप ही सिर्फ सीता माँ की तरह सर ढके थी , पर आप वहाँ गयी क्यो और छी छी आप अपनी लड़की को भी लेगाई । कल जब आप नहीं होगी वह अकेली जायेगी । सही तरह ट्रेन कर दिया कि नहीं !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

  19. घुघूती बासूती जी ने बहुत ही अच्छा लिखा है. साथ ही Test और दिनेशराय द्विवेदी जी से भी सहमत हूँ, विशेषकर उनका यह कहना की “आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना महिलाएं बराबरी का यह दर्जा प्राप्त नहीं कर सकतीं।”

  20. P.S.
    शायद मैं विषेय से थोडा हट रहा हूँ परन्तु फिर भी स्पष्ट करना चाहूँगा, की ऊपर की टिपण्णी में “आर्थिक रूप से स्वतंत्र” से मेरा मतलब केवल इतना है की प्रत्येक महिला में यह confidence और educational या technical skills होना आवश्यक है, की जरुरत पड़ने पर वो ख़ुद भी कमा सके. फिर चाहे वो घर संभालें, चाहे बाहर जा कर कमायें, या दोनों काम करें – यह उनकी मरजी होनी चाहिए. और यदि यह समाज इतनी basic freedom नहीं दे सकता तो फिर समाज बेकार है – सब मान समान की बातें खोक्ली हैं. और प्रत्येक eve-teasing/ molestation का incident – चाहे वो छोटा हो या बड़ा, इस basic freedom ko infringe करता है, इसलिए बहुत जरूरी है की ऐसा ना हो.

  21. मेरी टिपण्णी को गलत ढ्ग से लिया गया हे, मेने किसी भी नारी को मासं का टुकडा नही कहा हे,बस एक ऊधारण दिया था, अब मे आपने घर मे(पता नहीं राज भाटिया अपने घर मे फरक कैसे कर पाते होगे , अपनी माँ , बहिन , पत्नी और बेटी मे सब माँस ही तो है । जब चाहो जहाँ मुहं मार लो । क्या फरक पड़ता है)इन सब को केसे देखता हु,यह मेरे चारित्र पर हे लेकिन आप के यह शव्द(** जब चाहो जहाँ मुहं मार लो । क्या फरक पड़ता है***किस भाषा की ओर संकेत करते हे,मेने किसी की इज्जत के बारे कोई शव्द गलत नही लिखा,ओर आप मे से एक आध को छोड कर सबी मे मेरी मा बहिन एक करदी ,घुघूती बासूती आप को गलत समझ मे आई हे मेरी टिपण्णी, फ़िर भी बिना गल्ती हुऎ मे आप से माफ़ी चाह्ता हू ,मेरा मन आप को या किसी ओर को दुख देने या किसी की बेज्जती करने का नही था,जो कुछ आप लोगो ने दिया उस के लिये आप का ध्न्यवाद

  22. स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है कि उनमें जलन का भाव है. वो किसी की भी तरक्की नहीं देख सकती.अपने पति की भी नहीं दूसरी स्त्री की तो बिलकुल भी नहीं.पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं.ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है. समस्या स्त्रियों की ही नहीं पुरुषों की भी है. जिस प्रकार स्त्री घर चलाती है पुरुष भी कमाता है यह एक सामाजिक व्यवस्था. यदि स्त्री कमाये और पुरुष घर चलाये तो भी इसमें कुछ हानि नहीं. लेकिन यदि पुरुष घर चलाने लगेगा तो स्त्रियों को उससे भी इन-सिक्योरिटी होने लगेगी. इन-सिक्योरिटी स्त्री के गुण में है और पुरुषों से बराबरी करना भी उसी इंसिक्योरिटी का लक्षण है.जबकि देखा जाये तो कुछ मामलों में स्त्री आगे है तो कुछ में पुरुष. यह प्रतियोगिता का विष्य नहीं वरन सहभागिता का विष्य है. लेकिन कुछ स्त्रियाँ सहभागिता नहीं चाहती.लिखा तो बहुत कुछ जा सकता है पर हम पुरुषों का यह स्वभाव नहीं कि स्त्रियों की तरह हर चीज में खोट निकालें.

  23. ऐडम जी आप विषय का परिवर्तन क्यो करना चाहेते है , यहाँ बात केवल मुम्बई मे हुए हादसे की हो रही है . स्त्रियोचित गुण अवगुण कि नहीं . जरुरी नहीं है की आप अपनी स्त्रियों के प्रती अपनी भडास को इस ब्लोग के मंच पर निकले । स्त्रियों के लिये क्या उचित है क्या अनुचित इसका फैसला उन्हे ही करने दे ।” पुरुष व स्त्री के कुछ काम बंटे हुए हैं।ये एक सामाजिक व्यवस्था है.जो स्त्रियाँ घर के काम करना नहीं जानती या चाहती या जिनको घर के काम नहीं करने पड़ते वो ही स्त्रियाँ इस प्रकार के स्त्री विमर्श के मुद्दे उठाती है.” वैस आप का ये सेंटेंस बहुत पसंद आया क्योंकी मे तो उम्मीद कर रही थी आप ही ऐसा लिखेगे । आप तो आज भी adam – eve के ज़माने मे रह रहे हैं जबकी एव ने काफी तरकी कर ली है , मानसिक रूप से । आप का नाम कोई है नहीं , आदम और हव्वा के ज़माने के आप है , यहाँ ब्लोग पर क्यो अपना समय बर्बाद कर रहे हैं । और विषय प्रवर्तन करके आपने कुछ पुरुषो कि ” विचरते {घुमते } रहने की आदत को सही साबित किया है ।

  24. रचना जी ऎसा इसलिये क्योंकि यहाँ पर जो भी स्त्रीयों के महत्व के मुद्दे उठाये उन्होने अपने गुणों या अवगुणों से ही उठाये हैं.आप लोग फालतू में पुरुषों का विरोध करती हैं क्योंकि वही मिला है ना सीधा-साधा -और बेचारे पुरुष स्त्री-विरोधी ना कह दिये जायें इसलिये चुप भैठे हैं. दिल में उनके भी वही बातें हैं लेकिन सब डरते हैं. आपको स्त्री अधिकारों की इतनी ही चिंता है तो सामाजिक व्यवस्था का विरोध कीजिये ना.सामाजिक व्यवस्था पुरुष नहीं बनाता वरन स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर बनाते हैं.आज क्यों लोग भ्रूण हत्या करने पर विवश हैं-क्योंकि दहेज एक बुराई है .तो क्या केवल पुरुष दहेज लेता है.सबसे ज्यादा दहेज की लालची तो महिलाऎं होती है. नये नये जेवर,साडियाँ, कोस्मेटिक दहेज में किसे चाहिये महिलाओं को ही ना.लेकिन पुरुष की कमजोरी यही कि वो इसका विरोध नहीं करता. सास के अत्याचार को ससुर मौन सहमति दे देता है.क्यों? यह गलत है. लेकिन इससे सास का दोष कम नहीं हो जाता. असली दोषी तो वही सास है ना.

    लेकिन सामाजिक व्यवस्था का विरोध करेंगी तो कई स्त्रीयां भी विरोध में आ जायेंगी इसलिये सही है पुरुषों का विरोध करो. बेचारे पुरुष भी आड़े ना आयेंगे. जहाँ तक 31 दिसंबर की घटना का स्वाल है उसमें भीड़ की गलती है. लेकिन यही भीड़ पुरुषों का भी अहित कर सकती है स्त्री का भी. तो भीड़ का विरोध कीजिये ,भीड़ की मानसिकता का विरोध कीजिये. यदि वहाँ पर लड़्कियों की ही भीड़ होती तो वो भी एक पुरुष का बलात्कार कर देती.कई ऎसी घ्टनाओं का साक्षी रहा हूँ जहाँ मदमस्त लड़्कियों ने एक बेचारे पुरुष को कामवासना के वशीभूत हो मार दिया. उन लड़कियों के बारे में क्या कहेंगी जो एक शादी-शुदा मर्द से प्यार कर दूसरी स्त्री का दिल तोड़ती हैं.

    कहता हूँ ना मुँह ना खुलवाइये-वरना जितना आरोप एक स्त्री लगा सकती है उससे कहीं ज्यादा एक पुरुष.

  25. ऐडम जी
    aap jo kuch keh rahe hae mera pehla kament bhi wahi keh rahaa hae
    aap mudaae se kyon bhatka raheae hae sabko

  26. aur yaahan virodh kisis purush ka nahin ranjana jii ke tipaani per vichar vimarsh ho rahaa hae

  27. मिथिलेश वामनकर अपनी समीक्षा में क्या कहते हैं. यह आपको पढ़्ना चाहिए.

    यह रेखांकित करने लायक बात है कि अब स्त्री अपने जीवन के असंख्य क्लेशों का इतिहास अपनी ही जुबानी बताने को तत्पर है। एक जद के साथ उसे यह घोषित करना पड रहा है कि इतनी बडी दुनिया में उसकी अनुभूतियों को कोई स्थान नहीं मिल पा रहा है। महादेवी वर्मा ने लिखा है –
    विस्तृत नभ का कोई कोना
    मेरा न कभी अपना होना
    मैं नीर भरी दुःख की बदली –
    दूसरी ओर प्रसिद्ध नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ को जब इंग्लैण्ड के विश्वविद्यालय में उद्बोधन के लिये आमंत्रित किया गया तो उन्होंने कहा ‘मैं पहले अपने कमरे के विषय में बोलना चाहती हूँ।’ श्रोताओं की शंका का समाधान करते हुए फिर उन्होंने बताया कि इसका महिला लेखन से गहरा सम्बन्ध है क्योंकि कोई जगह होनी चाहिए जहाँ वे बै कर अपनी मानसिक दुनिया के सुख-दुःख और संघर्षों पर अपने आपसे विमर्श कर सके।’ दो बडी लेखिकाओं की यह पीडा दर्शाती है कि स्त्री होने के कारण ही उनकी कुछ अनसुलझी गुत्थियाँ थीं जो सभ्य समाज पर सबसे बडा प्रश्नचिह्न लगाती हैं। किसी सभ्य समाज के विकास की प्रक्रिया में स्त्री को अलग-थलग ही नहीं बल्कि ‘हेय’ माने जाने के कुछ और भी उदाहरण मिलते हैं जैसे क्यूसीडायडीज की सम्मति थी कि ‘जिस प्रकार किसी सभ्य स्त्री का शरीर उसके मकान के अन्दर बन्द रहता है वैसे ही उसका नाम भी बंद रहना चाहिए।’ सुकरात यह मानते थे कि नारी सभी बुराइयों का मूल है, उसका प्यार पुरुषों की घृणा से अधिक भयावह है। अरस्तु के अनुसार ‘नारी की तुलना में पुरुष स्वभावतः श्रेष् होता है क्योंकि नारी इच्छा शक्ति में निर्बल, नैतिकता में शिथिल और विचार-विमर्श में अपरिपक्व होती है।’
    ‘मनु’ के अनुसार तो स्त्री के लिये पति सेवा ही गुरुकुल में वास और गृहकार्य अग्नि होम है –
    पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
    रक्षन्ति स्थविरै पुत्रा न स्त्री स्वतन्भ्यमर्हति ।
    इस तरह सारे विधि, शास्त्र और व्यवस्था में स्त्री अपनी देह की ही ‘अनधिकारिणी’ होती है जैसे वह देह उसकी नहीं किसी एक व्यवस्था की है, जिसका संचालन पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है। स्त्रियाँ स्वयं भी यह अनुभव करती हैं और स्त्री विमर्श में भी यह चिन्ताएँ सामने आई हैं कि स्त्रियाँ दुनिया को अपनी नहीं पुरुष की आँखों से समझना और भोगना चाहती हैं। वे स्त्रियाँ जो पुरुष की ‘अनुकम्पा’ पर जीवन बसर करना अपनी ‘नियति’ मानकर स्वीकार कर चुकी हैं, उनकी ‘गिरवी’ रखी हुई आत्माओं पर किसी प्रकार का बोझ नहीं है। संकट उन प्रश्नाकुल स्त्रियों का है जो अपनी तयशुदा भूमिका और निर्धारित प्रायोजित और आदेशात्मक शब्दावली से आहत और अघायी हुई हैं। उनकी दिक्कत यह है कि वे अपने आपसे प्रश्न पूछने लगी हैं ‘ जैसे कि स्त्री के जन्म से मृत्यु तक के मसले ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच क्यों तैरते हैं ‘ क्यों लडका ‘चिरंजीवी’ और लडकी ‘सौभाग्यकांक्षिणी’ कहलाती हैं। सौभाग्यवती होकर जीना यदि स्त्री की पहली खुशी है तो वह सौभाग्य भी उसे सही अर्थों में प्राप्त क्यों नहीं है ‘ ऐसी ‘सौभाग्यशाली’ को दहेज के कारण जला देना ‘गलत’ नहीं है ‘ क्या यह ‘सही’ है कि स्त्री को बुद्धिमान न माना जाए ‘ ‘देह’ से शुरू होकर ‘देह’ पर ही उसकी इति मान ली जाए ‘ यह सारा झगडा अन्तहीन भी इन्हीं कारणों से बना हुआ है कि कुछ तो स्त्री जीवन का इतिहास और वर्तमान विडम्बनाओं और अन्तर्विरोधों से भरा है, दूसरा पुरुष प्रधान समाज का सोच भी संकीर्णताओं से घिरा हुआ है। पता ही नहीं चला कि कब स्त्री को व्रत, अनुष् ान, श्ाृंगार-सिन्दूर, पायल, बिछिया, बिन्दी, चूडी और मेहन्दी रंगे हाथों में बाँधकर उसकी देह पर कब्जा कर लिया गया। फिर मोहाविष्ट होकर स्त्री ने इसी खेल को अपना ‘सौभाग्य’ मान लिया। भोग्या बनकर वह स्वयं से प्रश्न पूछने से भी डरने लगी। कभी यह पूछने का साहस ही नहीं जुटा पायी कि ‘क्या मेरी संवेदनाओं, मेरी इच्छाओं, मेरी बुद्धि का किसी को पता चला ‘ क्या मैं भी अपने मन में बसी हजारों हजार इच्छाओं में किसी एक ‘इच्छा’ को व्यक्त करूँ ‘ क्या ‘मैं’ अपनी ‘सरीखी’ संरचना को जन्म दूँ ‘
    सारे विमर्श के केन्द्र में मुख्य चिन्ता यही है कि ‘आखर स्त्री का वजूद, उसका अस्तित्व क्या है ‘ क्या कोई रास्ता है जिस पर वह आजादी से चल सके ‘
    स्त्रियों के संघर्ष, उनके उत्पीडन, उनकी छटपटाहट से साहित्य जगत् में भी हलचल होती रही है। इसकी पहली अनुगूँज (कहानी में) बंग महिला (राजेन्द्र बालाघोष) की ‘कुम्भ में छोटी बहू’ और ‘दुलाईवाली’ कहानी में सुनाई देती है। इस प्रकार के लेखन की सबसे बडी विशेषता तो यही थी कि लेखिकाओं ने समाज के शक्ति केन्द्रों पर निशाना साधा था। यह सच उतना ही पारदर्शी है जितने में स्त्री अपनी भाषा और अपने भोगे हुए यथार्थ को अपनी रचनाओं में व्यक्त करे, गोया रचना को ही ‘आइना’ बना ले। लेखिकाओं ने अपनी रचनाओं में जिस स्वानुभूत सच्चाइयों को उजागर किया वे कुछ ज्वलन्त प्रश्नों को जन्म देती हैं। इस संदर्भ में महिला लेखन की परख करना जरूरी है क्योंकि इनके लेखन में स्त्री जीवन की चिन्ताएँ सामाजिक, आर्थिक, कानूनी और पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के मुद्दों के रूप में विश्लेषित हुई हैं। यह सच ही है कि महिला लेखन में लगातार कुछ नया और उद्वेलित करता हुआ सच उद्घाटित हो रहा है। सबसे बडी चिन्ता तो यही है कि सम्पूर्ण सामाजिक और पारिवारिक ढाँचे में स्त्री को जगह तलाश करना। एक बडी साजिश यह हुई है कि स्त्री के मन को उसकी देह से पृथक कर दिया गया है। एकबारगी देखने से ऐसा लगता है कि उसकी आत्मा को मारकर, सोच की शक्ति को कुचलकर केवल देह को ही केन्द्र में रखा गया है। स्त्री-देह के प्रति पुरुष वर्ग का यह षड्यन्त्र वोल्गा की ‘राजनैतिक कहानियाँ’ नाम के संग्रह में खुलकर सामने आया है। स्वयं लेखिका की स्वीकारोक्ति है कि ‘शरीर के शोषण से स्त्री को मानसिक रूप से दमित रखना, उसके व्यक्तित्व के विकास को रोककर उसके शरीर को नियंत्रित रखना एक गहरी राजनीति है जो पुरुष प्रधान समाजों के मूल्यों के साथ गुँथी हुई है। अपना निजी काम समझकर जिसमें स्त्रियाँ अपनी पूरी ऊर्जा उण्डेल देती हैं वे काम दरअसल उनके लिये नहीं होते।
    समाज की धारणा है कि शरीर तथा मन दो अलग-अलग ईकाइयाँ हैं और वह अवसर के अनुसार कभी मन तो कभी शरीर को अहमियत देने लगता है। लेखिका का मानना है कि हम अपने शरीर से अलग नहीं हैं, अब इस बात को स्पष्ट रूप से कहना अनिवार्य है। वोल्गा ने पूरी संवेदनशीलता के साथ आँख, कान, नाक, बाल आदि यानी स्त्री को पूरी देह की क्षमताओं को पुरुष और स्त्री तथा स्त्री और परिवार के सम्बन्धों की कसौटी पर परखा है। वोल्गा ने अपनी सभी कहानियों में उन अनुभवों की हिस्सेदारी की है जो कटु और यथार्थ है। इस रूप में कि स्त्री शोषण का मुख्य आधार शारीरिक दृष्टि से ही अधिक है। संग्रह की पहली कहानी ‘सीता की चोटी’ पढकर ऐसा लगता है कि स्त्री को सभी काम सामाजिक दिखावे, रीति-रिवाजों के निर्वहन पति, बच्चों आदि के लिये करने पडते हैं। बालों की देखभाल, उनका लम्बा और सुन्दर होना, उनमें फूल लगाना, चोटी बनाना कब उचित और कब अनुचित हो जाता है, इसका निर्णय सीता के हाथ में कभी रहा ही नहीं। पति गुजरा नहीं कि सिर मुण्डवाने का दबाव पडता है। अगर बाल सँवारने का काम सीता स्वयं के आनन्द के लिये करती है तो पति की मृत्यु के बाद क्यों नहीं कर
    सकती ‘ जीवन के उत्तरकाल में जबकि बाल सफेद हो गए, झडने लगे तब उसे समझ में आने लगा कि अपने बालों पर ही उसका हक नहीं है तो फिर औरत की पूरी देह पर कितनी क्रूरता से औरों का हक जम जाता होगा ‘
    ‘आँखें’ कहानी में स्त्री स्वाधीनता के प्रश्न को उ ाया गया है। लडकियाँ बचपन से ही समाज द्वारा बनाए गए साँचे में ढाल दी जाती हैं। लडकियों पर बहुत से निषेध थोप दिये जाते हैं। लडकी और लडके के भेद को इस कहानी में बडी सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। किसी भी लडकी की आँखें कितनी भी सुन्दर और बडी क्यों न हो वह दुनिया नहीं देख सकती, उस पर पुरुष प्रधान परिवार के लाख पहरे हैं। जबकि राम अपनी छोटी-छोटी आँखों से दुनिया देख सकता है, खा सकता है, घूम सकता है, खेल सकता है। ‘लडकी’, ‘लडकी’ ही बनी रहे इसमें स्त्रियों की दासता जनित सोच भी जम्मेदार है। उसे माँ ने डाँटा ‘क्या इधर- उधर देखती रहती है। सर नीचा करके चलो। लडकी की निगाहें हमेशा नीची ही रहनी चाहिए।’ कथ्य में जो उद्वेलन है वह प्रश्नों के रूप में बार-बार कौंधता है जैसे ‘देखने के बाद कुछ तो करना चाहिये नहीं तो देखने का क्या फायदा’ देखने के पहले, देखने के बाद भी एक जैसा रहेंगे तो देखना ही क्यों ‘
    महिलाएँ अपने दैहिक सौन्दर्य के प्रति कितनी सचेत हैं इससे भी अधिक चिन्ता उन लोगों को है जो स्त्री को केवल दैहिक आधारों पर परखते हैं। रमा की नाक ‘बेसरी’ कहानी में चर्चा का विषय है और प्रकारान्तर से लेखिका ने यह चिन्ता व्यक्त की है कि रमा के साथ जो हो रहा है वह गलत है। रमा की नाक का छेद और दाग सबको दिखाई देता है किन्तु कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि वह कितनी शिक्षित है, उसके मन में इस बात की कितनी नाराजगी है कि ‘अब वैसा जमाना हो गया कि विवाह के लिये वर पक्ष वालों की इच्छानुसार वधुओं को अवयव बदलने पडेंगे। अब तक हर लडके वालों ने रमा की नाक के छेद पर टिप्पणी की तो पिता ने उसकी नाक की सर्जरी करवायी। फिर एक रिश्ता आया है। दहेज तय हो गया। वर पक्ष वाले खुश हैं। बस सत्यनारायण की एक ही इच्छा है कि लडकी की नाक में बेसरी हो। बेसरी पहनने के लिये फिर नाक में छेद करवाना। किन्तु रमा ने तय किया – ‘अब बिलकुल नाक में छेद नहीं करवाऊँगी। यह शादी रुक जाएगी तो रुकने दो।’ विडम्बना यह है कि पहले लडके वालों की आपत्ति हुई तो नाक का छेद बंद करवाया। अब फैशन है और लडका चाहता है लडकी नाक में बेसरी तो फिर से ……. ।
    जानकी के दिमाग की सबसे बडी उलझन यही है कि क्यों उसे मुँह बन्द करने के लिये कहा जाता है जबकि उसके भाई जोर-जोर से चिल्लाते हैं। ‘मुँह बन्द करो’ कहानी स्त्री के दिमाग पर चोट करती है क्योंकि ‘शब्द मुँह से निकलते हैं पर उनका जन्म तो दिमाग से होता है।’
    स्त्रियों में अपने शरीर और शरीर धर्मों के प्रति हीन भावना पैदा करने की जम्मेदारी पितृसत्तात्मक समाज की है। शिक्षक, नजदीक के रिश्तेदार, पति, पिता, भाई इन सभी के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध स्त्री को अपना जन्मना ही ‘पाप’ लगने लगता है। इस संकलन की ‘दीवारें’, ‘रक्षक’ ‘क्या करना चाहिए’ आदि कहानियों में महिलाओं की अवास्तविक जंदगी का दारुण दुःख व्यक्त हुआ है। पुरुष प्रधान समाज की इस राजनीति को समझना होगा कि परिवार में उनको विभाजित करके रखा जाता है। सास, ननद, बहू, जे ानी, देवरानी के झगडे करवाये जाते हैं। घर में वे मित्र नहीं शत्रु की तरह रहती हैं। लेखिका का इशारा इस ओर भी है कि स्त्रियों को इन कहानियों को पढकर अपने ‘भ्रम’ दूर कर लेने चाहिये। प्रेम, वात्सल्य, कर्त्तव्य और जम्मेदारी के नाम पर उसे ‘घर’ देकर पुरुष अपने राजनैतिक खेल खेलता है। यह राजनीति ‘घर’ और ‘सुरक्षा’ के नाम पर खेली जाती है जहाँ निरन्तर स्त्री के आत्मगौरव को ेस पहुँचाती रहती है। ‘पत्थर के स्तन’ कहानी का टीचर और मामा, ‘एक राजनीतिक कहानी’ का पति, ‘आर्ति’ कहानी के माँ और पिता, ‘विवाह’ कहानी की सामाजिक परम्परा की अनिवार्यता आदि में स्त्री के विचार, भाषा, अनुभूति सब कुछ कुचलकर उसे स्त्री-गरिमा की कई सीढयों से नीचे धकेल दिया गया है। एक तथ्य इसमें अन्तर्निहित है और वह यह कि देह के भीतर बसे मन और बुद्धि में जो स्वतंत्रता और आत्मबोध का ज्ञान है वह पितृसत्ता को चुनौती देता है। देह के प्रति अनाधिकृत आकर्षण और फिर उस पर मनचाहा नियंत्रण, यही लोगों का मुख्य ध्येय है।
    स्त्री और स्त्री समुदाय की दासता के कितने रूप समाज में बिखरे पडे हैं, उन पर भी ध्यान देने की जरूरत है। हम जब भी अपनी सुप्त चेतना को झकझोरते हैं तो इस सत्य को जान पाते हैं कि स्त्रियों से सम्बन्धित कई धार्मिक और सामाजिक विषय ऐसे हैं जिन्हें हम ‘प्रथा’ कहकर महत्त्व ही नहीं देते हैं। स्त्री समुदाय पर पूरा कब्जा बना रहे इसलिये उन्हें कई प्रकार की अतिवादी भावाकुलताओं से जोडे रखा जाता है। भारतीय समाज का अस्तित्व शायद ऐसी ही प्रथाओं के बलबूते पर बना रहता है। जया जादवानी की कहानी ‘जो भी यह कथा पढेगा’ भारतीय सांस्कृतिक जीवन के परम्परागत ढाँचे में हस्तक्षेप करती प्रतीत होती है। यह कहानी उन तमाम स्त्रियों के जीवन के उस पाखण्ड का पर्दाफाश करती है जो धर्म के नाम पर सदियों से चलता आ रहा है। व्रत, अनुष् ान, पूजापा के कर्म विधानों से स्त्रियाँ वैसे ही जकडी हुई हैं फिर अब उनके व्यस्त कार्यक्रमों में सीरियल भी आ जुडे हैं। अब उन्हें दुनिया देखने की फुर्सत ही कहाँ है ‘ गहने, कपडे, सौन्दर्य प्रसाधनों से दबी ढँकी इन स्त्रियों को अपनी मुख्य समस्या का बोध ही नहीं है। औरतों और लडकियों ने ‘तीज’ का व्रत किया, अपने घर की उकताहट, झल्लाहट और रूटीन से हटने के लिये सामूहिक रूप से मंदिर गयीं। पूजा, कथा श्रवण सब कुछ की व्यवस्था है किन्तु वहाँ उन्होंने सुनने के सिवा मनचाहा सब कुछ किया। सुष्मिता सेन की बातें, फिर मन का कुछ न कर पाने की हताशा, चाँद निकलने का इन्तजार और इन सबके बीच यह अनुभूति कि व्रत की इन कहानियों में लहुलुहान औरतों की आत्माएँ हैं। सभी स्त्रियाँ धार्मिक पर्वों पर निरपेक्ष रहती हैं। उनकी आस्थाएँ ‘छूट’ लेना चाहती हैं, पानी न पीना हो तो दूध पीने का मन बनाना, खीर की जगह चाप्सी और चाउमीन खाना और घर में पति यानी शासक नहीं बल्कि पुरुष, ‘मानवीयता’ की तलाश करना, एक तरह से रूढयों के प्रति विद्रोह है। वे स्त्रियाँ जो व्रत करती हैं और वे जो बिना आस्था के व्रत करने को मजबूर हैं, उन्हें अब यह महसूस होने लगा है कि व्रतों की कहानियों में स्त्री की कमजोरियाँ दर्शायी जाती हैं। ‘सुहागन’ बने रहने में ही वे सुरक्षित अनुभव करती हैं। व्रतों की अतिवादी भंगिमा को तोडती यह कहानी जो भी पढेगा, जैसा कि शीर्षक भी है, वह इस सत्य से साक्षात्कार करेगा कि बहुत ही खूबसूरती से स्त्रियों के लिये ऐसी मर्यादाओं का घेरा बना दिया गया है जिसमें रहते-रहते स्त्री की क्षमताएँ चुकती जा रही हैं। हजारों वर्षों से स्त्रियों के आदर्श सीता और सावित्री ही रहे हैं। इन ‘मिथकों’ के सहारे ही शेष जीवन बिताने की चाह रखना कितना खतरनाक है। एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि जिनके लिये स्त्री व्रत करती है, भूखी-प्यासी, थकी-क्लांत रहती है, क्या वह उससे प्रेम करता है और क्या यही पति उसे जन्म-जन्मान्तर चाहिये’
    इस सन्दर्भ में शती के पूर्वार्द्ध में लिखी हुई यशपाल की कहानी ‘करवा का चौथ’ का उल्लेख करना प्रासंगिक ही होगा जिसमें स्त्री जीवन के अन्तर्विरोध अधिक व्यंग्यात्मक होकर व्यंजित हुए हैं। पति की प्रताडनाओं से तंग और क्षुब्ध पत्नी करवा चौथ के व्रत पर भूखे रहने की तुलना में रोटी खा लेती है और पति के पीटने पर चिल्लाते हुए कहती है – मार ले जितना मारना हो, मैंने कौन-सा तेरे लिये व्रत किया है।’ यह संवाद स्त्री के चेतना सम्पन्न होने का बहुत ही सार्थक उदाहरण है जिसमें सम्बन्धों की कसौटी व्रत

  28. बहन जी,आपकी साहित्यिक चेतना वन्दनीय है,अद्भुत है.आपसा कहानियो का मिमान्सक जगत मे मिलना दुर्लभ है.
    साधुवाद.

  29. aap log bina mudee ke bhi lad sakte ho ya aap log sachmuch me kafi budimaan ho . dusre ko dekhna jaruri hai kya kaise dekhte honge log aur fir yaad rakhna wohi purani dakiyanoosi baate estree aur purash ki ladai . ek ghar me 5 log rahte hai aur 5 type ke hote hai aise hi desh aur duniya jiotne log hai utne type ke hai . aur aap log faltu type ke ho . bus itna fark hai .sab me aur aap logo me

  30. मै एक साइबर मुसाफ़िर हूं और नेट पर भटकते रहता हूं अनेक जगह जाता हूं और तरह तरह के लोगो से मिलता हूं और अजब गजब दुनिया को देखता हूं, यहां भी भटकते हुए पहुंच गया आप जैसे स्वयंभू बुद्धिजीवीयों को बहस करते हुए देखा वह भी स्त्री और पुरुष के विषय में आश्चर्य घोर आश्चर्य । रंजना जी और उसी तरह के दूसरे लोगों को लगता है जैसे समाज और लोगों को चरित्र का प्रमाण पत्र देने का उन्हें किसी ने ठेका दे दिया है। ये इंटरनेट है यहां पलक जपकते ही ऎसी हजारों लडकियां मिल जायेगी जो चंद रुपयों की खातिर नग्न होने में जरा भी शर्म नही करती। यहां ऎसी वेबसाइटें भी है जहां सभ्रांत परिवार की औरतें “पुरुष वेश्या” के लिये मुंह मांगा दाम चुकाने के लिये तैयार रहती है, ऎसे में केवल पुरुषों को ही दोष देना गलत है।

    रंजना जी ने उपर कहीं स्त्री और पुरुष को प्रकृति ने क्या दिया है इसका वर्णन किया है और साथ ही यह भी कहा है कि पुरुषों को शारीरिक बल भी प्रकृति ने अधिक दिया है, यह सत्य है लेकिन मैं आगे यह जोडना चाह्ता हूं कि प्रकृति ने पुरुषों को काम-वासना के मामले में अत्यन्त निर्बल बना दिया है, अपनी काम भावना को छुपाने में पुरुष पुरी तरह से अक्षम है , जब सारे जीव प्रकृति ने ही बनाए हैं तो स्वाभाविक है भावनाएं भी प्रकृति प्रदत्त ही है। वैसे तो आयुर्वेद में कहा गया है कि स्त्री में पुरुष की अपेक्षा आठ गुना अधिक “काम” होता है, लेकिन सहनशक्ति की अपनी ताकत से वो उसे छुपाने में सफ़ल हो जाती है।

    मैं यहां अंत में यही कहना चाह्ता हूं स्त्रियां ये बात अच्छी तरह से समझ ले कि पुरुष समाज अपनी काम भावनाओं को छुपाने मे प्राकृतिक रुप से असमर्थ है उसे प्रकृति ने वो शक्ति प्रदान ही नही की है, इसलिये यदि कोई स्त्री इस तरह की बात स्वयं के साथ पसंद नही करती तो उसे अपने आचरण में सुधार लाना होगा अन्यथा जब भी लक्षमण रेखा को लांघेगी उसे कॊई न कॊई रावण जरुर मिलेगा।

  31. रंजना जी ने उपर कहीं स्त्री और पुरुष को प्रकृति ने क्या दिया है इसका वर्णन किया है और साथ ही यह भी कहा है कि पुरुषों को शारीरिक बल भी प्रकृति ने अधिक दिया है, यह सत्य है लेकिन मैं आगे यह जोडना चाह्ता हूं कि प्रकृति ने पुरुषों को काम-वासना के मामले में अत्यन्त निर्बल बना दिया है, अपनी काम भावना को छुपाने में पुरुष पुरी तरह से अक्षम है , जब सारे जीव प्रकृति ने ही बनाए हैं तो स्वाभाविक है भावनाएं भी प्रकृति प्रदत्त ही है। वैसे तो आयुर्वेद में कहा गया है कि स्त्री में पुरुष की अपेक्षा आठ गुना अधिक “काम” होता है, लेकिन सहनशक्ति की अपनी ताकत से वो उसे छुपाने में सफ़ल हो जाती है।

  32. sabhi budhijiviyo ko namaskar,gyan ki jugali se samadhan nahi hota,asli baat to ye hai ki mahila-purush ko kudrat ne alag-alag jimewari di hai sansar chalane ke liye.dono ki saman jarurat hai.

  33. mai nahi manta ki mahila har baat kai liyai jimmaidar hai per itna kah shakta hu ki aurat pardai mai rahkar puri duniya jeet shak ti hai….

  34. is baat se fark nahi parta hai kai kisne kya pahna tha ya vo kab kahan mauzud tha. aham ye hai ki kya bura hua. kisi ko choot pahuchna bura hai aur bura rahega. kai martaba larkiyan kuch galat kar sakti hai par mere khyal se vo bura sirf chorna ya zaban se bura bolna hi hota hai to larai ko usi ke hathiyar se zaari rakho zo hathiyar dushman ke pas hai…. yahi to mard ko pahchan hi. kisi bhi soooooorat main aurat par hath uthana zayaz nahi hai. kattai nai. agar aadmi shrab piye to bura hai phir bhi vo aisa kar sakta hai to aurat ke sandarbh main bhi yahi kaha ja sakta hai.

    Zanab halat badal rahen hain Zara nazariya bhi badaliye.

    koi bhi gunah ho aurat ka magar balatkar saza nahi bansakti…..

    Jai Sri Ram

  35. Sabhi Aadaraniy blogers! Mujhe sirf itana kahana hai ki Purush ke man me Istri ke sareer ko lekar jo sahaj jigyasa hai wohi use bar bar is tarah ke kutsit karyon ke liye prerak ka karya karati hai. Yah bat dono par lagu hoti hai, fark sirf itana hai ki Nari ki sahamati se sthapit kiye gaye deh sampark ko sayad hi koi jan pata hai. Parantu prasn wohi hai hai ki kisi ki marzi ke bagair kiye gaye is karya ko zayaz nahi mana ja sakata hai. Isaka sahaj samadhan hai dono ko sareerik ango ki sampurn aur tathyatamak janakari upalabdha kara kar hi is samasya ko kam kiya ja sakata hai.Jin ladakiyon ki bat ho rahi hai sach me puchha jay to unki marzi me PRE-SEX koi galat bat nahi hogi aur sayad yahi nasa aur masti ki khoj me wo gayi bhi rahi hogi lekin voilent love and voilent sex sayad hi koi pasand kare. Sirf blog warta is samasya ka samadhan nahi hai, ek dusare par keechar uchhalate hue chatakharedar bahas ka hissa ban hum bhi kuch kuch waisi hi galati kar rahe hai kyoki SEX PLEASURE anek madhyamo se ho sakata hai aur sayad yahi hum bhi kar rahe hai. khud se suruwat kare aur apane bachcho ko apana bharatiya sansakar aur Scientific Knowledge pradan kare tha is amanveeya vyawahar ko rakane me apana mahatwapurna yogadan de.
    Kshama Yachana k Sath
    Vinay Kumar Singh

  36. Mujhe english me likana nahi aata hai. Please is me hindi writing ka aption bhi upalabdha karayen. Mere jaise logo ko madad melegi. Dhanyabad.

  37. ye Itsri MAA hai …. Bahen hai…..Biwi hai …. or beti hai…..ye na hoti to kuch na hota …..esliye istri ka samman karen hamesh….

    RAM Dut ji ne shai kaha … me sahamt h …..
    रंजना जी ने उपर कहीं स्त्री और पुरुष को प्रकृति ने क्या दिया है इसका वर्णन किया है और साथ ही यह भी कहा है कि पुरुषों को शारीरिक बल भी प्रकृति ने अधिक दिया है, यह सत्य है लेकिन मैं आगे यह जोडना चाह्ता हूं कि प्रकृति ने पुरुषों को काम-वासना के मामले में अत्यन्त निर्बल बना दिया है, अपनी काम भावना को छुपाने में पुरुष पुरी तरह से अक्षम है , जब सारे जीव प्रकृति ने ही बनाए हैं तो स्वाभाविक है भावनाएं भी प्रकृति प्रदत्त ही है। वैसे तो आयुर्वेद में कहा गया है कि स्त्री में पुरुष की अपेक्षा आठ गुना अधिक “काम” होता है, लेकिन सहनशक्ति की अपनी ताकत से वो उसे छुपाने में सफ़ल हो जाती है।

  38. sabko namaskar, blog ki duniya me ye mera pahala pravesh hai jo sanyog bas hi hai. bas yun hi padh raha tha,tamam bate kahi gayi,aarop lagaye gaye.mera ye manana hai ki jab tak har aadami ya aurat kudrat dwara tay ki gayi sima se bahar jayga,har chij ko bhog ki bastu samjhega,samane wale ke prati apani soch ko nahi badalega isaki punravriti hoti rahegi,kyon ki yanha samne wale ke badalte hi us subject ke bare me najariya badal jata hai. jab apani beti jins pahane to koi bat nahi jab dusari ladaki pahane to “mal”(mafa karenge)sabase pahale apani soch badalani hogi.

  39. Rajana ji ka kahana sabko bura kyo lag raha hai—unhono thik kaha ki —-Raat ko 1 baje sharab peekar samunder ki sair karna—ho to… to patwar ko kas kar pakad kar chaley—-ye pura sach hai ki kam vastro main stri—ankho ko sukh to deti hi hai—sath main man ko bhi vichlit karti hi hai—chahey wah kitna hi pada pasand kyon na ho—-comment bolney wale aor likhney wale khud samjthey hai ki—stri apni dasha ki khud hi jimedar hai—phir kam vastro main dekh kar rongtey ke sath aor kya kya khada ho jaye—kahana atishokti nahi hogi

  40. jo hamare samaj ne hade tay kar rakhi he wo bilkul sahi he agar orat apni hd me rahti he to wo samman pati he or had se baher gai to beijjat ho jati he ye niyam bilkul purusho pr bhi hota he samman pane ke liye jeena chahiye barabari pane ke liye nahi agar smaj me samman hoga to barabri to apne aap mil jayegi or agar samman nahi hoga misal ke tor pe agar kulkshni stree he to koi usse baat karni pasnd nahi kart or agar samjhdar stree he to log apni seat chhodkar us stree ko betha dete he bhai .sex problem se agar apke jeevan me kasht ho raha he to un pursh o ke liye he sikender-e-azam plus capsule aap iske istemaal se apne sex life bachakar smaj me samman ke bhagi ban sekte he aapne itne achhe topic par discussion kiye iske liye apka dhanywad

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